'आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होता है टेलीग्राम', कोर्ट में केंद्र का बड़ा बयान
Delhi High Court on Telegram: दिल्ली हाईकोर्ट में नीट परीक्षा पेपर लीक मामले के बाद टेलीग्राम ऐप पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को लेकर बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई हुई. टेलीग्राम ने केंद्र सरकार द्वारा ऐप को ब्लॉक करने के फैसले को अदालत में चुनौती दी है. इस पूरे मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति तेजस कारिया की अदालत में की गई. अदालत की कार्यवाही के दौरान टेलीग्राम और केंद्र सरकार दोनों ही पक्षों की ओर से देश के दिग्गज वकीलों ने अपनी अपनी दलीलें पेश कीं.
टेलीग्राम की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा, जबकि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा अदालत में उपस्थित हुए. अदालत ने याचिकाकर्ता पक्ष से इस मामले के अंतिम आदेश पर अपनी दलीलें रखने को कहा, जिसके बाद कानूनी बारीकियों पर लंबी बहस शुरू हो गई.
सरकार के आदेश में गिनाईं गंभीर खामियां
सुनवाई की शुरुआत में टेलीग्राम के वकील ध्रुव मेहता ने सरकार के आदेश में गंभीर कानूनी खामियां गिनाईं. उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार का यह आदेश केवल एक अंतरिम निर्देश की पुष्टि करता है, जिसे पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता है. इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अंतरिम आदेश की पुष्टि करना या उसे पलट देना हर मामले के अलग तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है.
ध्रुव मेहता ने कानून के एक विशेष प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी ऐप को ब्लॉक करने के लिए संबंधित विभाग के सचिव का संतुष्ट होना बेहद जरूरी है. सचिव को लिखित में ठोस कारण बताते हुए ही निर्देश जारी करने का अधिकार मिला हुआ है. उन्होंने जोर देकर कहा कि उपलब्ध जानकारी पर पूरी तरह सोच विचार करने की झलक सरकार के आदेश में साफ तौर पर दिखनी चाहिए.
प्रतिबंध के अधिकार के बुनियादी स्वरूप पर भी उठाए सवाल
टेलीग्राम की ओर से प्रतिबंध के अधिकार के बुनियादी स्वरूप पर भी बड़े सवाल उठाए गए. ध्रुव मेहता का कहना था कि नीट पेपर लीक के बाद पैदा हुई स्थिति कोई ऐसी आपातकालीन स्थिति नहीं थी कि पूरे ऐप को ही बंद कर दिया जाए. उन्होंने तर्क दिया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत केवल विवादित या अवैध जानकारी को ब्लॉक करने का नियम है, पूरे के पूरे प्लेटफॉर्म या ऐप पर प्रतिबंध लगाना कहीं से भी सही नहीं है. उन्होंने सचिव द्वारा सोच समझकर निर्णय लेने और आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करने पर विशेष जोर दिया. ध्रुव मेहता ने कोर्ट के सामने 16 जून के विवादित संचार का भी जिक्र किया. इस पर हाईकोर्ट ने भी आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों और उनके कानूनी आधारों पर सवाल पूछे.
अदालत का क्या रहा रुख?
अदालत ने सुनवाई के दौरान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत टेलीग्राम की जिम्मेदारी भी तय करने की बात कही. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टेलीग्राम को इस कानून की धारा 79 के तहत अपनी सावधानी बरतनी होगी. चूंकि टेलीग्राम एक मध्यस्थ यानी इंटरमीडिएरी के रूप में कार्य करता है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी बड़ी हो जाती है. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि धारा 79 एक स्वतंत्र दायित्व है, जिसका धारा 69ए से कोई सीधा संबंध नहीं है.
हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि धारा 69ए के तहत मिली शक्तियों के सही और सटीक इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाना चाहिए. ध्रुव मेहता ने अदालत को बताया कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए की ओर से इस मामले में एक आपातकालीन अनुरोध भेजा गया था. इस पर कोर्ट ने कहा कि वह स्थिति वास्तव में आपातकालीन थी या नहीं, इसका अंतिम फैसला संबंधित प्राधिकरण को ही करना होगा.
इसके बाद ध्रुव मेहता ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भेजा गया एनटीए का वह अनुरोध पत्र पढ़कर सुनाया. इस पर अदालत की पीठ ने स्पष्ट किया कि आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए कानून में तीन चरण निर्धारित किए गए हैं. इन चरणों में नामित अधिकारी, विभाग के सचिव और एक विशेष समिति शामिल होती है. याचिकाकर्ता को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि इस मामले में इन तीनों चरणों का सही ढंग से पालन नहीं किया गया है. ध्रुव मेहता ने नामित अधिकारी के नजरिए का जिक्र करते हुए कहा कि सचिव के जवाब में केवल कानूनी धाराओं को बार बार दोहरा देने से काम नहीं चलेगा. उन्होंने याद दिलाया कि उच्चतम न्यायालय ने भी पहले इस तरह के रवैये की कड़ी आलोचना की है. किसी भी प्रतिबंध की संतुष्टि केवल उपलब्ध पुख्ता जानकारी और सामग्री के आधार पर ही होनी चाहिए.
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दिल्ली: पुलिस ने मानव तस्करी गिरोह का किया भंडाफोड़, पांच नवजात शिशुओं का रेस्क्यू
नई दिल्ली, 18 जून (आईएएनएस)। दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को मानव तस्करी से जुड़े एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो बच्चों की तस्करी में संलिप्त था। इस गिरोह में संलिप्त 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें प्रमुख रूप से तस्कर, मध्यस्थ, खरीदार और एक अस्पताल मालिक शामिल थे। इस दौरान पुलिस ने दिल्ली, हरियाणा और मध्य प्रदेश से पुलिस ने छह नवजात शिशुओं को भी रेस्क्यू किया है।
जांच में एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया गया है, जो संगठित रूप से बच्चों की तस्करी में संलिप्त था। यह गिरोह मुख्य रूप से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में व्यापक स्तर पर सक्रिय था। वहीं, अस्पताल का मालिक कथित रूप से अवैध गर्भपात में सहायता प्रदान करता था। साथ ही, नवजात बच्चों के ट्रांसफर के लिए फर्जी दस्तावेजों दिलाने में भी मदद करता था।
सबसे पहले, डिकॉय ऑपरेशन के रूप में 20 हजार रुपये लिए जाते थे। इसके बाद, नवजात बच्चों को खरीदने के लिए 2 लाख 92 हजार 400 रुपये की राशि ली जाती थी। पुलिस की ओर से की गई पड़ताल के बाद, गुजरात से नवजात बच्चों की आपूर्ति करने वाले शख्स को गिरफ्तार किया गया।
पुलिस के मुताबिक, पांच जून को जानकारी प्राप्त होने के बाद पुलिस की तरफ से पहाड़गंज एरिया के पास आरके आश्रम मार्ग के पास एक डिकॉय ऑपरेशन शुरू किया गया, जहां पुलिस ने ज्योति उर्फ कमलेश, शालू और ललित को ग्राहकों को नवजात बच्चों को बेचने के दौरान ही मौके से गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान एक नवजात शिशु को सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर लिया गया, जो मुश्किल से महज चार से पांच दिनों का ही होगा।
इस मामले में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 143(4), 61(2) और 3(5) और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत पहाड़गंज पुलिस स्टेशन में दर्ज किया। इस जांच का जिम्मा सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट की ऑपरेशंस यूनिट की डब्ल्यू/एसआई प्रगति को सौंपा गया था।
पुलिस जांच में यह सामने आया है कि गिरफ्तार हुआ आरोपी अंतरराज्यीय स्तर पर मानव तस्करी से जुड़े गिरोह का हिस्सा है। इस गिरोह से जुड़े लोग विभिन्न जगहों पर बच्चों को खरीदते थे और इसके बाद उन्हें उन दंपतियों को बेच दिया करते थे, जिनके पास बच्चे नहीं होते थे।
पुलिस जांच में यह सामने आया है कि ज्योति गिरोह की मुख्य आरोपी थी और अलग-अलग स्रोतों से उसने बच्चे प्राप्त किए थे। इसमें एक आपूर्तिकर्ता की पहचान सायबाभाई ग़मर उर्फ़ कालिया के रूप में हुई है, जो कि मूल रूप से गुजरात और राजस्थान से नवजात बच्चों को प्राप्त करती थी।
आरोपी ज्योति से मिली जानकारी के आधार पर दो अन्य आरोपियों को भी दबोचा गया, जिनकी पहचान प्रतिभा और विपिन के रूप में हुई है। यह सभी दूसरे नवजात बच्चों का बंदोबस्त करने में जुटे हुए थे। इस गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने इनके पास 2 लाख 92 हजार 400 रुपये भी बरामद किए हैं। जांचकर्ताओं का मानना है कि ये सभी नवजात शिशुओं को खरीदने में लिप्त थे।
इसके अलावा, पुलिस जांच में ओमवती का भी नाम सामने आया है, जो कि गुरुग्राम में घरेलू सहायिका के रूप में काम करती है। पुलिस का आरोप है कि ओमवति ने पूरे मामले में मध्यस्थता का किरदार अदा किया और नवजात शिशुओं का इंतजाम करने में अहम भूमिका निभाई थी। नवजात शिशुओं का इंतजाम करने के बाद उसे बाल तस्करी से जुड़े गिरोह को बेचने के लिए दे दिया जाता था।
वहीं, पुलिस जांच में डॉ. विवेकी का भी नाम सामने आया है, जो कि हीरा मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल के मालिक हैं। यह अस्पताल दिल्ली के बेगमपुर इलाके में स्थित है। जांच में सामने आया है कि अस्पताल बाल तस्करी में अहम भूमिका निभा रहा था, क्योंकि सभी शिशुओं को इसी अस्पताल में रखा जाता था। इसके बाद ऐसे दंपति की तलाश की जाती थी, जो निसंतान रहते थे।
जांच में यह भी सामने आया है कि मनगढंत दस्तावेज जैसे अस्पताल के रिकॉर्ड, प्रजनन संबंधी दस्तावेज और अन्य दस्तावेज जुटाए जाते थे, जो कि नवजात बच्चों के ट्रांसफर में सहायक साबित होते थे।
पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह को बड़े ही नेटवर्ट के बलबूते संचालित किया जाता था, जिसमें प्रमुख रूप से आपूर्तिकर्ता, मध्यस्थ, वाहन चालक और खरीदार शामिल हुआ करते थे।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, नवजात शिशुओं को राज्य के विभिन्न इलाकों से प्राप्त करके उसे दिल्ली गिरोह के सदस्यों को सौंप दिया जाता था। एक बार नवजात शिशु को दिल्ली में लाए जाने के बाद उसे छिपाकर, चिकित्सकीय देखरेख में और संभावित खरीदारों को अवैध रूप से हस्तांतरित करने के लिए तैयार किया जाता था।
इस नेटवर्क के ज़रिए संतानहीन दंपतियों की पहचान की गई, जो बच्चे की तलाश में थे। आरोप है कि कानूनी पितृत्व स्थापित करने और शिशुओं के हस्तांतरण को सुविधाजनक बनाने के लिए जाली रिकॉर्ड और सहायक दस्तावेज़ तैयार किए गए। इसके बाद बच्चों को लाखों रुपये तक की भारी रकम में बेच दिया गया।
--आईएएनएस
एसएचके/डीएससी
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