Explainer: अमेरिका-ईरान समझौते से तेल बाजार को राहत, लेकिन कब तक पटरी पर लौटेगा कारोबार?
Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव के बीच एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है. दोनों देशों के बीच युद्ध रोकने और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग हॉरमुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को लेकर शुरुआती समझौता हो गया है. इस खबर के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि हालात पूरी तरह सामान्य होने में अभी काफी समय लग सकता है.
तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट
समझौते की खबर मिलते ही वैश्विक बाजार में तेल व्यापारियों ने राहत की सांस ली. निवेशकों को उम्मीद है कि अब तेल की सप्लाई धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी. पिछले कई महीनों से हॉरमुज जलडमरूमध्य बंद होने के कारण तेल की आपूर्ति प्रभावित थी, जिससे कीमतें लगातार बढ़ रही थीं. अब मार्ग खुलने की संभावना से बाजार में सकारात्मक माहौल बना है.
हॉरमुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
हॉरमुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है. मध्य पूर्व के कई बड़े तेल उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात अपने तेल निर्यात के लिए इसी मार्ग का इस्तेमाल करते हैं. दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुंचने वाला तेल इसी रास्ते से गुजरता है.
ईरान द्वारा इस मार्ग को बंद किए जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी संकट पैदा हो गया था. तेल टैंकरों की आवाजाही रुक गई थी और कई देशों को उत्पादन कम करना पड़ा था.
ट्रंप ने जलडमरूमध्य खोलने का किया ऐलान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि हॉरमुज जलडमरूमध्य को शुक्रवार से फिर से खोल दिया जाएगा. इसके साथ ही उन्होंने ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त करने का आदेश भी दे दिया है.
दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा है कि दोनों पक्षों के बीच 60 दिनों का संघर्ष विराम लागू किया जाएगा. इस दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत होगी, जिनमें ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने का विषय भी शामिल रहेगा.
लाखों बैरल तेल उत्पादन हुआ था बंद
हॉरमुज जलडमरूमध्य बंद होने के कारण मध्य पूर्व के कई देशों को तेल उत्पादन रोकना पड़ा था. तेल कंपनियों के पास तैयार तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने का रास्ता नहीं था, इसलिए उत्पादन में भारी कटौती करनी पड़ी.
इसका सबसे ज्यादा असर इराक, कुवैत, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों पर पड़ा, जिनकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात पर निर्भर करती है.
रोजाना 14 मिलियन बैरल उत्पादन ठप
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार इस संकट के दौरान रोजाना 14 मिलियन बैरल से अधिक तेल उत्पादन प्रभावित हुआ. यह पूरी दुनिया की कुल तेल मांग का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ देशों में उत्पादन एक सप्ताह के भीतर शुरू किया जा सकता है, लेकिन सभी तेल क्षेत्रों को पूरी क्षमता तक पहुंचने में काफी समय लगेगा. कई जगह मशीनरी और बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है.
तीन महीने में केवल 70 प्रतिशत उत्पादन बहाल होने की उम्मीद
ऊर्जा विश्लेषण कंपनी वुड मैकेंजी के विशेषज्ञों का मानना है कि तेल उत्पादन को पूरी तरह सामान्य करना आसान नहीं होगा. उनके अनुसार यदि कंपनियां सावधानी के साथ काम शुरू करती हैं तो भी अगले तीन महीनों में केवल 70 प्रतिशत उत्पादन ही बहाल हो पाएगा.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि छह महीनों के भीतर उत्पादन 90 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, लेकिन बाकी बचे उत्पादन को फिर से शुरू करने में और अधिक समय लग सकता है. कुछ क्षेत्रों में तकनीकी और सुरक्षा चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं.
रिफाइनरियों को भी हुआ भारी नुकसान
सिर्फ तेल उत्पादन ही नहीं, बल्कि तेल रिफाइनिंग सेक्टर भी इस युद्ध से प्रभावित हुआ है. कई रिफाइनरियों को सीधे नुकसान पहुंचा, जबकि कई प्लांट सुरक्षा कारणों से बंद कर दिए गए थे.
युद्ध के दौरान दुनिया की लगभग 3.5 प्रतिशत रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित हुई. जिन रिफाइनरियों को केवल एहतियात के तौर पर बंद किया गया था, उन्हें दो सप्ताह के भीतर फिर से चालू किया जा सकता है. लेकिन जिन संयंत्रों को नुकसान पहुंचा है, उनकी मरम्मत में महीनों लग सकते हैं.
46 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है मरम्मत खर्च
ऊर्जा शोध संस्था रिस्टैड एनर्जी का अनुमान है कि मध्य पूर्व में तेल और पेट्रोकेमिकल परिसंपत्तियों को हुए नुकसान की मरम्मत पर लगभग 46 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं.
इसमें क्षतिग्रस्त पाइपलाइन, तेल भंडारण केंद्र, रिफाइनरी और अन्य ऊर्जा ढांचे की मरम्मत शामिल है. यह खर्च कई देशों और कंपनियों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है.
गैस और एलएनजी सप्लाई भी हुई प्रभावित
युद्ध का असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहा. प्राकृतिक गैस और एलएनजी यानी लिक्विड नेचुरल गैस की सप्लाई भी बुरी तरह प्रभावित हुई.
कतर समेत कई बड़े गैस उत्पादकों ने सुरक्षा कारणों से उत्पादन कम कर दिया था. एलएनजी उत्पादन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें गैस को शून्य से नीचे 162 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर तरल रूप में बदला जाता है.
इस प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने में कम से कम दो सप्ताह का समय लग सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दबाजी करने पर संयंत्रों को और नुकसान पहुंच सकता है.
कतर की एलएनजी क्षमता को बड़ा झटका
कतर एनर्जी के अधिकारियों के अनुसार ईरानी हमलों की वजह से देश की लगभग 17 प्रतिशत एलएनजी उत्पादन क्षमता पूरी तरह नष्ट हो गई. इस क्षमता को दोबारा विकसित करने और उत्पादन को पहले के स्तर पर लाने में पांच साल तक का समय लग सकता है.
इसका असर एशिया और यूरोप के उन देशों पर भी पड़ सकता है जो बड़ी मात्रा में कतर से एलएनजी आयात करते हैं.
दुनिया भर में घट गया तेल भंडार
तेल सप्लाई रुकने का असर वैश्विक भंडार पर भी पड़ा है. कई देशों ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग किया.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेल का स्टॉक वर्ष 2003 के बाद सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया है.
एक अरब बैरल से ज्यादा तेल हुआ कम
निवेश प्रबंधन कंपनी 'नाइनटी वन' के प्राकृतिक संसाधन प्रमुख पॉल गुडेन के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक तेल भंडार में एक अरब बैरल से ज्यादा की कमी आई है.
मौजूदा कीमतों के आधार पर इस तेल का मूल्य लगभग 83 अरब डॉलर से अधिक बैठता है. यही कारण है कि अब दुनिया भर की सरकारें अपने रणनीतिक भंडार को फिर से भरने की तैयारी कर रही हैं.
आने वाले वर्षों तक दिखेगा असर
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते ने तत्काल राहत जरूर दी है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तेल और गैस बाजार पर इस संकट का असर कई वर्षों तक बना रह सकता है. उत्पादन, रिफाइनिंग और भंडारण व्यवस्था को पूरी तरह पटरी पर लाने में लंबा समय लगेगा.
दुनिया भर के देश अब ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं और भविष्य में ऐसे संकटों से बचने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और ऊर्जा स्रोतों पर भी ध्यान दे रहे हैं. फिलहाल बाजार को राहत मिली है, लेकिन पूरी तरह सामान्य स्थिति लौटने में अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है.
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