एक देश भारत के लिए बहुत बड़ा सरदर्द बन गया है। यह देश भारत विरोधी अपराधियों और आतंकियों का नया अड्डा बन गया है। इसी वजह से यह देश भारत के टारगेट पर आ गया है। यह देश भारत का अगला बड़ा शिकार बनने वाला है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि पाकिस्तानी आतंकियों के साथ-साथ ये देश अब ख़स्तानियों का नया घर बन गया है। अभी तक खालिस्तानी कनाडा से अपना सबसे बड़ा नेटवर्क चला रहे थे। लेकिन भारत सरकार के एक्शन के बाद कनाडा की सरकार ने खालिस्तानियों पर नकेल कसनी शुरू कर दी। जिसके बाद पाकिस्तान की मदद से खालिस्तानियों ने अपना नेटवर्क इस देश में बनाना शुरू कर दिया। अजरबैजान ही भारत का अगला बड़ा टारगेट है। वैसे हम आपको बता दें कि भारत ने अजरबैजान का तगड़ा इलाज शुरू भी कर दिया है। मुस्लिम देश अज़रबैजान की गर्दन तोड़ने के लिए उसके पड़ोसी देश में भारत के हथियार पहुंचा दिए गए हैं।
दरअसल यह तो आप जानते ही हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। अजरबैजान को पाकिस्तान और तुर्की का पूरा समर्थन मिलता है। ये तीनों देश मिलकर भारत के खिलाफ सबसे ज्यादा षड्यंत्र कर रहे हैं। इसी कड़ी में अजरबैजान की राजधानी बाकू में एक बहुत बड़ी भारत विरोधी कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेंस में खुलकर भारत को बर्बाद करने की बातें की गई। बाकू में हुई इसी कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तानी और ख़ालिस्तानी आतंकी पहुंचे। भारत में आतंक फैलाने के लिए इन सभी ने सिखों और मुस्लिमों का नाम लेना शुरू कर दिया। इस कांफ्रेंस में गद्दार ख़ालिस्तानियों ने कहा कि हमारे सिख भाई परेशान है| जबकि असलियत यह है कि ख़ालिस्तानी सिख नहीं है। ख़ालिस्तानियों का सिख धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। भारत के सिखों का नाम लेकर यह ख़ालिस्तानी आतंकी पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलते हैं और अब इन्होंने अपनी नई दुकान अजरबैजान में खोल ली है। अजरबैजान में हुई इस भारत विरोधी बैठक में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा पहुंचे। इसी के साथ कनाडा, यूके और अमेरिका से आए ख़ालिस्तानी समर्थकों ने भी इस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया।
इस कांफ्रेंस की शुरुआत में कनाडा में मारे गए खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निजर के लिए मौन रखा गया। खतरे की बात यह है कि अजरबैजान में हुए इस सम्मेलन के 11 दिन बाद ही गुजरात के स्कूलों और फिर उसके बाद मंदिरों और सरकारी इमारतों में ब्लास्ट की धमकियां मिलनी शुरू हो गई। धमकी भरे ईमेल खालीस्तान नेशनल आर्मी ने भेजे थे। यह साबित करता है कि भारत में दहशत फैलाने का यह पैटर्न अजरबैजान की बैठक में तैयार किया गया था। इसी कड़ी में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र में भी धमकी भरे ईमेल आए। इनमें भी हिंदू मंदिरों, सरकारी इमारतों, स्कूलों और रेल नेटवर्क को बम से उड़ाने की धमकी दी गई। यानी पानी सर के ऊपर जा चुका है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत ने अजरबैजान के पड़ोसी और दुश्मन अर्मेनिया को हथियार दिए थे। इसीलिए अजरबैजान खालीस्तानियों को अपनी जमीन दे रहा है। लेकिन भारत ने अज़रबैजान के पक्के इलाज की तैयारी शुरू कर दी है। भारत अर्मेनिया में एक बहुत बड़ा नेटवर्क बना रहा है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में आपको अजरबैजान में भी अज्ञात हमलावर दिख जाएं। वैसे भारत ने अर्मेनिया में गोला बारूद भर दिया है।
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मुश्किल दौर से गुजर रहे अफगानिस्तान की मदद के लिए भारत एक बार फिर आगे आया है। भारत ने मानवीय सहायता के तहत काबुल को 5 टन जरूरी दवाइयों की खेप भेजी। यह कदम सिर्फ राहत सामग्री पहुंचाने तक सीमित नहीं है बल्कि दोनों देशों के दशकों पुराने रिश्तों और भारत की उस नीति को दर्शाता है जिसमें जिसमें पड़ोसी देशों के लोगों के कल्याण को प्राथमिकता दी जाती है। इससे पहले भी भारत ने अफगानिस्तान के स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। हाल ही में भारत ने अफगान स्वास्थ्य अधिकारियों को आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की सौगात दी थी। इनमें नवजात और बच्चों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले उपकरण, वेंटिलेटर, मरीजों की निगरानी करने वाली मशीनें, कार्डियोग्राफ मशीन, प्लास्टिक सर्जरी किट और अन्य विशेष मेडिकल उपकरण शामिल थे। इन संसाधनों से अफगान अस्पतालों की क्षमता बढ़ने की उम्मीद थी। भारत लगातार यह संदेश दे रहा है कि उसकी प्राथमिकता अफगान की जनता है।
चाहे खाद्य सुरक्षा का सवाल हो, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो या फिर शिक्षा और कौशल विकास के पहलू। भारत ने हर स्तर पर अफगान लोगों का साथ निभाने की कोशिश की। संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने साफ कहा है कि वह अफगान में शांति, स्थिरता और विकास के लिए सहयोग जारी रखेगा। दरअसल भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते सिर्फ कूटनीतिक नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भी हैं। दोनों देशों के संबंध सदियों पुराने हैं। पिछले दो दशकों में भारत ने अफगानिस्तान के विकास में अरबों डॉलर का निवेश किया। काबुल में संसद भवन का निर्माण, अफगान भारत मैत्रीबान, सड़कों और बिजली परियोजनाओं का विकास, अस्पताल और स्कूलों की स्थापना जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट भारत की साझेदारी की मिसाल थी। इसके अलावा हजारों अफगान छात्रों को भारत में पढ़ाई के लिए छात्रवधियां भी दी गई। यही वजह है कि अफगानिस्तान में भारत के प्रति सकारात्मक भावना आज भी दिखाई देती है। सत्ता परिवर्तन के बाद भी भारत ने अपने मानवीय सहयोग को जारी रखा और आम अफगान नागरिकों की मदद पहुंचाने का प्रयास किया। यहां पर एक और बात गौर करने वाली है।
लंबे समय तक अफगानिस्तान को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखने वाला पाकिस्तान आज नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। आज तालिबान के साथ सीमा विवाद, सुरक्षा संबंधी मुद्दों और व्यापारिक बाधाओं को लेकर लगातार तनाव बढ़ा हुआ है। ऐसे में अफगानिस्तान अब व्यापार और संपर्क के लिए नए विकल्प तलाश रहा है। और इसी रणनीति के तहत तालिबान भारत से करीबी चाहता है और भारत भी लगातार अफगान जनता की मदद करते आया। यहां पर एक और बड़ी बात है। भारत और ईरान के चाबहार पोर्ट के जरिए व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की कोशिशें अफगानिस्तान की इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
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