15 अगस्त की सुबह लाल किले की प्राचीन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वो गर्जना जिसने भारतीय रक्षा गलियारों में एक नई हलचल पैदा कर दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ भाषण नहीं दिया बल्कि भारत की हवाई संप्रभुता का नया घोषणापत्र जारी कर दिया। अब यह ऐलान है स्वदेशी फाइटर जेट इंजन का आज मेरा लाल किले की प्राचीन से मेरे देश के युवा वैज्ञानिकों को मेरे टैलेंटेड यूथ को मेरे इंजीनियर्स को और प्रोफेशनल्स को और सरकार के हर विभागों को भी मेरा आह्वान है क्या हमारा अपना मेड इन इंडिया फाइटर जेट्स के लिए जेट इंजीन हमारा होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले 12 सालों के बदलाव का एक ऐसा रिपोर्ट कार्ड पेश किया जिसने आलोचकों को चुप करा दिया। पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत अब सिर्फ बातें नहीं करता बल्कि जमीन पर नतीजे दिखाता है। प्यारे देशवासियों पिछले 12 वर्षों में डिफेंस प्रोडक्शन करीब चार गुना। खादी और ग्रामोद्योग का उत्पादन करीब पांच गुना हुआ। इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग करीब सात गुना बढ़ा। आधुनिक रेलवे कोच का निर्माण 21 गुना बढ़ा। मोबाइल फोन उत्पादन 33 गुना बढ़ा। इतना ही नहीं आधुनिक युग को देकर के भी डिजिटल और इनोवेशन की दुनिया में भी हमने अपना परचम लहराया। इंटरनेट यूजर इंटरनेट कंज्यूमर करीब करीब चार गुना बढ़े। पेटेंट ग्रांट होने की संख्या चार गुना बढ़ी। डिजिटल ट्रांजैक्शन 100 गुना बढ़े। सामान्य मानवी की सुविधाओं की तरफ भी हमने उतना ही गंभीरता से काम किया। हर साल औसतन 15 गुना ज्यादा तेजी से हमने नल से जल कनेक्शन दिए।
हर साल औसतन छह गुनी ज्यादा रफ्तार से लोगों को गैस कनेक्शन दिए। हर साल चार गुनी रफ्तार से गरीबों के लिए टॉयलेट बनाने का काम किया। हर साल तीन गुना ज्यादा तेजी से गरीबों को घर देने का काम किया। देश ने गवर्नेंस में भी बहुत बदलाव लाया। हजारों की संख्या में कंप्लायंसेस खत्म किए। सैकड़ों की तादाद में पुराने कानून खत्म किए। पिछली शताब्दी के कानूनों से 21वीं शताब्दी की मार्च नहीं हो सकती। हमने आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मेट्रो का विस्तार किया। हमने पब्लिक ट्रांसपोर्ट को ताकत दी। जिस स्पीड से काम जिस स्केल पर काम किया यह सब यह रफ्तार यह विस्तार ये अचीवमेंट आजादी के बाद पहली बार पिछले एक दशक में देखा है। और जब इतनी सारी सिद्धियां हमारे सामने हो, इतनी तेज गति दिखाई देती हो, देशवासियों का सामर्थ्य पल-पल प्रकट होता है। तब तो 2047 में विकसित भारत बनने का संकल्प कभी भी अधूरा नहीं रह सकता है। यह सारे आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि हम आगे बढ़ने वाले हैं।
अब आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में परमाणु बम बनाना आसान है। लेकिन एक फाइटर जेट का इंजन बनाना उससे कहीं ज्यादा जटिल है। आज दुनिया में सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ही ऐसे देश हैं जिनके पास अपनी पूरी तरह से स्वदेशी जेट इंजन तकनीक है। चीन भी इसमें दशकों से लगा है लेकिन उसे भी अब तक पूर्ण सफलता नहीं मिली है। एक फाइटर जेट इंजन के अंदर का तापमान 1600 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है। यह इतना तापमान है कि साधारण स्टील मक्खन की तरह पिघल जाए। इसके लिए सिंगल क्रिस्टल ब्लेड और सुपर एलॉय जैसी तकनीक चाहिए होती है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लाल किले से कहा कि इंजन हमारा ही होना चाहिए तो उनका इशारा किसी क्रिटिकल टेक्नोलॉजी को घर में विकसित करने की ओर था। अभी हमारे पास तेजस है लेकिन उसका दिल यानी कि इंजन अमेरिकी है। पीएम मोदी चाहते हैं कि आने वाले समय में तेजस मार्क 2 या एमका के अंदर जो भी इंजन धड़के वो मेड इन इंडिया हो। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों में एक इमोशनल टच भी था। उन्होंने कहा कि भारत के नागरिकों के पसीने से बनी हुई वह चीजें जिसमें भारत की मिट्टी की महक हो हम उसे ही खरीदेंगे। यह एक बहुत बड़ा नीतिगत बदलाव है। यह सेनाओं और सरकारी विभागों को एक स्पष्ट आदेश है कि अब प्राथमिकता स्वदेशी ही होगी।
अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे एक सामूहिक संकल्प बताया। जब 140 करोड़ से ज्यादा लोग तय कर लेते हैं कि हमें स्वदेशी बनना है तो बाजार की ताकतें भी झुक जाती है। जेट इंजन के निर्माण से ना केवल हजारों हाईटेक नौकरियां पैदा होंगी बल्कि भारत की अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा भी बचेगी जो हम इंजनों के रखरखाव और खरीद में खर्च करते हैं। अब लाल किले से हुआ यह ऐलान भविष्य के भारत की नींव है। स्वदेशी इंजन का मतलब है कि युद्ध के समय हमें किसी दूसरे देश के सामने हाथ नहीं फैलाने होंगे। अगर कोई भी देश हमें पुर्जे देने से मना भी कर देता है तो भी हमारे विमान आसमान में दुश्मनों से मुकाबला करते रहेंगे। खैर स्वतंत्रता दिवस पर भारत ने अपनी गुलामी की एक और बेड़ी विदेशी तकनीक पर निर्भरता को तोड़ने का संकल्प लिया है।
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ईरान ने अमेरिकी और पश्चिमी देशों की दादागिरी को खत्म करने के लिए ब्रिक्स यानी ब्रिक्स संगठन का इस्तेमाल करते हुए फाइनल गेम प्लान तैयार कर लिया। एक ऐसा प्लान जो ट्रंप प्रशासन के होश उड़ाने के लिए काफी है। अमेरिका और ईरान की दुश्मनी कोई नई नहीं है। लेकिन जब से डोनाल्ड ट्रंप वापस सत्ता में आए हैं, उन्हें ईरान के चारों तरफ एक सख्त आर्थिक दीवार खड़ी कर दी है। इसे ही कहते हैं आर्थिक नाकेबंदी। अमेरिका ने दुनिया भर के देशों से कह दिया है कि कोई भी ईरान से तेल नहीं खरीदेगा और अगर कोई खरीदेगा तो अमेरिका उस पर बैन लगा देगा। इतना ही नहीं ईरान को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम जिसे Swift कहते हैं उससे बाहर निकाल दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि ईरान ना तो अपना तेल किसी को बेच पा रहा था और ना ही दुनिया से अपनी करेंसी में व्यापार कर पा रहा था। ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह संकट में थी। अमेरिका का प्लान साफ था।
ईरान को इतना मजबूर कर दो कि वो घुटने टेक दे। लेकिन अमेरिका यह भूल गया जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है और ईरान ने ठीक यही किया। अब आते हैं कहानी में ट्विस्ट। ईरान ने समझ लिया कि अकेले अमेरिका से लड़ना मुश्किल नहीं है। इसीलिए उसने हाथ उन देशों से जो खुद अमेरिका की नीतियों से परेशान है। ईरान जनवरी 2024 में bricks का पक्का सदस्य बन गया था। लेकिन असली मास्टर स्ट्रोक तो ईरान ने अब खेला है। ईरान ब्रिक्स के बैंक जिसे न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी कहते हैं उसका हिस्सा बनने जा रहा है। अब तक ईरान डॉलर के बिना अंतरराष्ट्रीय व्यापार नहीं कर पा रहा था। लेकिन ब्रिक्स बैंक में आते ही ईरान अब रूस के साथ रूबल में, चीन के साथ युवान में और भारत के साथ रुपए में सीधा बिजनेस कर सकेगा। यानी 20 से ही अमेरिकी डॉलर का पत्ता पूरी तरह साफ।
अमेरिका का जो बड़ा हथियार था डॉलर ईरान ने ब्रिक्स के जरिए उसकी हवा निकाल दी। इस पूरे खेल के पीछे एक बहुत मजबूत त्रिकोणीय गठबंधन काम कर रहा है जिसे दुनिया रूस, चीन और ईरान की तड़ी कह रही है। इसमें चीन की भूमिका एक आर्थिक रीड जैसी है क्योंकि चीन लगातार ईरान से भारी मात्रा में सस्ता तेल खरीद रहा है। कच्चा तेल खरीद रहा है और बदले में ईरान को एडवांस टेक्नोलॉजी और पैसे दे रहा है। वहीं दूसरी तरफ रूस जो खुद अमेरिकी प्रतिबंधों को झेल रहा है। रूस ने ईरान से मिलकर एक नया बैंकिंग मैसेजिंग सिस्टम बना लिया है ताकि उन्हें पश्चिमी देशों के स्विफ्ट सिस्टम की जरूरत ना पड़े। ये दोनों देश मिलकर एक नया रेल कॉरिडोर भी बना रहे हैं जिससे रूस का सामान ईरान होते हुए सीधे एशिया तक पहुंच सके। अब बात करते हैं सबसे जरूरी हिस्से की। इस पूरे ड्रामे में भारत का क्या स्टैंड है? भारत के लिए बहुत स्थिति नाजुक है। एक तरफ पुराना दोस्त ईरान है। जहां भारत चाब पोर्ट बना रहा है। वहां बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद जरूरी है। क्योंकि इसके जरिए हम पाकिस्तान को छोड़े बिना सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंच सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबार पोर्ट के काम पर असर पड़ा है। भारत पर भी दबाव है कि वह ईरान से दूरी बनाए रखें। लेकिन भारत की विदेश नीति अभी बहुत स्मार्ट है। भारत ने ईरान के साथ एक अस्थाई कामकाजी रास्ता निकाला है। हमारा निवेश भी सुरक्षित रहे और अमेरिका भी ज्यादा नाराज ना हो।
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