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Vishwakhabram: US-Israel ने पूरी ताकत लगा ली, मगर फिर भी मैदान में कैसे सीना तान कर डटा हुआ है Iran?

अमेरिका और इजरायल की लगातार सौ दिन से अधिक चली भीषण बमबारी, शीर्ष सैन्य कमांडरों की मौत, तेल आय पर चोट और ढांचागत तबाही के बावजूद ईरान आखिरकार कैसे अब भी घुटनों पर नहीं आया है। यही वह सवाल है जिसने पूरी दुनिया को चौंका रखा है। सवाल उठ रहा है कि आखिर वह कौन-सी ताकत है जो तेहरान को अब भी टिकाए हुए है? दुनिया जानना चाहती है कि कैसे एक ऐसा देश, जिसकी अर्थव्यवस्था वर्षों से प्रतिबंधों और अलगाव का बोझ झेल रही थी, वह युद्ध के इतने गहरे घावों के बाद भी अपने नागरिकों और सैनिकों की जरूरतें पूरी कर पा रहा है?

हम आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक युद्ध ने ईरान को करीब तीन सौ सैंतालीस अरब डॉलर का नुकसान पहुंचाया है और इस वर्ष उसकी अर्थव्यवस्था छह प्रतिशत से अधिक सिकुड़ सकती है। अस्पताल, विद्यालय, गैस क्षेत्र, इस्पात संयंत्र और रिहायशी इलाके तक हमलों में तबाह हो चुके हैं। हजारों लोगों की मौत हुई और लाखों परिवारों की जिंदगी बिखर गई है। इसके बावजूद ईरान की व्यवस्था पूरी तरह ढही नहीं है। यही बात पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है।

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दरअसल ईरान कोई साधारण अर्थव्यवस्था नहीं है। उसने दशकों तक युद्ध, आर्थिक नाकेबंदी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच जीना सीखा है। अमेरिका द्वारा परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद लगाए गए कठोर प्रतिबंधों ने ईरान को पहले ही आत्मनिर्भर बनने की दिशा में धकेल दिया था। यही वजह है कि आज जब तेल व्यापार पर हमला हुआ, तब भी ईरान पूरी तरह से टूट नहीं पाया।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब फरवरी में अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया। माना जा रहा था कि इससे वैश्विक तेल बाजार के साथ-साथ खुद ईरान की कमर भी टूट जाएगी, क्योंकि दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का तेल कारोबार इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन यहां ईरान की वर्षों पुरानी तैयारी काम आई। युद्ध से ठीक पहले तेहरान ने तेजी से तेल निर्यात बढ़ाकर भारी राजस्व जमा कर लिया था। यही भंडार अब उसके लिए सुरक्षा कवच बना हुआ है।

ईरान ने केवल तेल पर भरोसा नहीं रखा। उसने छद्म कंपनियों और गुप्त समुद्री बेड़ों का ऐसा जाल तैयार किया था जिसके जरिए उसका तेल निर्यात जारी रहा। कई जहाज समुद्र में अपने संकेतक बंद कर देते हैं और बीच समुद्र में दूसरे जहाजों में तेल स्थानांतरित कर देते हैं ताकि उन पर नजर नहीं रखी जा सके। यह पूरी रणनीति वर्षों से प्रतिबंधों से लड़ते लड़ते विकसित हुई है।

तेहरान ने एक और बड़ा दांव खेला। ईरान सरकार ने कृषि, इस्पात और पेट्रोरसायन जैसे कई जरूरी उत्पादों के आयात पर कड़ी रोक लगाई, लेकिन साथ ही उन क्षेत्रों के निर्यात को बढ़ाया जो होर्मुज मार्ग पर निर्भर नहीं थे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ रेल व्यापार में अचानक तेजी आई। उत्तरी बंदरगाहों को भी सक्रिय किया गया, जिनका पहले मुख्य उपयोग रूस के साथ व्यापार के लिए होता था। इस रणनीति ने ईरान को पूरी तरह अलग थलग पड़ने से बचा लिया।

देखा जाये तो इन सबके पीछे एक पुरानी आर्थिक सोच भी काम कर रही है। वर्ष 2013 में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने आर्थिक प्रतिरोध की नीति लागू की थी। इसका उद्देश्य विदेशी आयात पर निर्भरता घटाकर घरेलू उत्पादन को मजबूत करना था। भारी शुल्कों के कारण विदेशी सामान बाजार से गायब होने लगे और स्थानीय उद्योगों को जगह मिली। आज वही नीति युद्ध के दौर में ईरान के लिए ढाल साबित हो रही है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि ईरानी जनता आराम से जीवन जी रही है। हालात बेहद कठिन हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक इस वर्ष ईरानी अर्थव्यवस्था दशकों की सबसे खराब गिरावट का सामना कर सकती है। मुद्रास्फीति 77 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है और ईरानी मुद्रा रियाल लगातार ऐतिहासिक गिरावट दर्ज कर रही है। रोजमर्रा की वस्तुएं आम लोगों की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। अंडे, चावल और आलू तक महंगे हो गए हैं। लोग मांस और चिकन छोड़कर सोयाबीन जैसे सस्ते विकल्प अपनाने को मजबूर हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक, स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि अब किताबें और टैक्सी यात्रा जैसी सामान्य सेवाओं के लिए भुगतान कठिन हो रहा है। नकदी संकट के कारण परिवार उधार पर निर्भर हो गए हैं। बेरोजगारी भी तेजी से बढ़ी है। ईरान के श्रम और सामाजिक कल्याण मंत्रालय के अनुसार अमेरिका ईरान तनाव शुरू होने के बाद से कम से कम दस लाख नौकरियां खत्म हो चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम का अनुमान है कि करीब 41 लाख लोग अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे जा सकते हैं।

यही नहीं, युद्ध से पहले भी ईरान की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। अमेरिकी प्रतिबंधों ने विदेशी मुद्रा की आपूर्ति लगभग खत्म कर दी थी। डॉलर की कमी के कारण आयात महंगे होते गए और जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ता गया। रियाल की गिरावट के खिलाफ देश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिन पर कठोर कार्रवाई भी हुई। ईरान सरकार ने केंद्रीय बैंक प्रमुख को बदला, नकद सहायता योजनाएं शुरू कीं और सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाए, लेकिन जनता को राहत नहीं मिल सकी।

उधर, इस तरह की खबरों के बीच एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब भारत स्थित ईरानी दूतावास ने मीडिया में चल रही उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि ईरान में आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी हो गई है। दूतावास ने दावा किया कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के नेतृत्व में सरकार ने आपूर्ति व्यवस्था को पूरी तरह स्थिर बनाए रखा है और देश में किसी जरूरी वस्तु का संकट नहीं है। साथ ही कुछ विदेशी माध्यमों पर पक्षपातपूर्ण खबरें फैलाने का आरोप भी लगाया गया।

यहां सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या आर्थिक संकट ईरान में सत्ता परिवर्तन का कारण बन सकता है? विश्लेषकों का मानना है कि जन असंतोष जरूर बढ़ रहा है, लेकिन सत्ता परिवर्तन का खतरा फिलहाल सीमित है। इसका कारण इस्लामी रिवोल्यूशनरी गार्ड का मजबूत नियंत्रण और अमेरिका, इजरायल विरोधी भावना का उभार है। युद्ध ने जनता के बड़े हिस्से को सरकार के पीछे खड़ा कर दिया है।

फिर भी भविष्य आसान नहीं दिखता। ईरान को अपने ढह चुके ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए भारी निवेश की जरूरत होगी। पश्चिमी देशों में इस बात की चर्चा तेज है कि पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर का अंतरराष्ट्रीय निवेश लाया जा सकता है। लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या प्रतिबंधों, युद्ध और आर्थिक तबाही के बावजूद ईरान अपनी जिद और प्रतिरोध की नीति के सहारे आगे भी टिक पाएगा, या आने वाले दिन उसके लिए सबसे कठिन परीक्षा साबित होंगे।

-नीरज कुमार दुबे

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