सिलिकॉन वैली के एक आलीशान टेक ऑफिस में सन्नाटा पसरा है। स्क्रीन पर कोडिंग की लाखों लाइनें तैर रही हैं। एक तरफ दुनिया के बेहतरीन कंप्यूटर इंजीनियर्स सिर पकड़े बैठे हैं, और दूसरी तरफ शांत मुद्रा में दार्शनिक दिख रहे हैं। यह दृश्य उस हकीकत को बयां करता है, जिसने टेक वर्ल्ड के पुराने ढर्रे को पूरी तरह पलट दिया है। एक दशक पहले युवाओं को कहा जाता था-‘नौकरी चाहिए तो कोडिंग सीखो।’ लेकिन अब कोडर्स नौकरियों को लेकर चिंतित हैं, जबकि फिलॉसफी के छात्रों की मांग बढ़ रही है। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट्स की बेरोजगारी दर 7%, जबकि दर्शनशास्त्र ग्रेजुएट्स की सिर्फ 5.1% है। येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लुसियानो फ्लोरिडी कहते हैं,‘दर्शनशास्त्र विभागों से छात्रों और प्रोफेसरों का ‘टेक कंपनियों में जाने का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। कंप्यूटर को तो गणित व कोड की भाषा समझ आती है, तो दार्शनिकों की जरूरत क्यों..? प्रो. फ्लोरिडी कहते हैं, क्योंकि कंप्यूटर को कोडिंग सिखाने से ज्यादा मुश्किल उसे नैतिकता सिखाना है। आज के एआई मॉडल्स की सबसे बड़ी समस्या ‘चापलूसी’ और ‘मतिभ्रम’ है। वे अक्सर वही कहते हैं जो यूजर सुनना चाहता है, चाहे झूठ ही क्यों न हो। इसे सुधारने के लिए दार्शनिकों ने सुकरात की पद्धति अपनाई, जिससे एआई को अपनी अज्ञानता का अहसास कराया जाता है। गूगल डीपमाइंड के दार्शनिक इयासोन गैब्रिएल बताते हैं कि इस दार्शनिक विनम्रता से एआई के झूठ बोलने की आदत में भारी कमी आई है। इतना ही नहीं, एंथ्रोपिक ने क्लाउड मॉडल के लिए 78 पन्नों का ‘संविधान’ बनाया है, जिसे कर्मचारी कंप्यूटर की ‘आत्मा का दस्तावेज’ कहते हैं। इसमें जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के विचारों की मदद ली गई, जिससे मॉडल को नैतिक दिशा मिली। जैसे-जैसे गाड़ियां खुद चलने लगी हैं और एआई हथियारों पर फैसले लेने लगा है, उलझनें गहरी हो रही हैं। क्या बुजुर्ग की जान बचाने के लिए बच्चे की जान दांव पर लगाई जाए? पर्यावरण बचाने के लिए विकास रोका जाए? ऐसे सवालों का हल सिर्फ कोडिंग से नहीं, बल्कि सदियों पुराने दार्शनिक विचार के मंथन से ही निकल सकता है। कंप्यूटर को गुरु बनाना खतरनाक आलोचक ‘नैतिक कौशल के खत्म होने’ को लेकर चिंतित हैं... अगर कंप्यूटर ही नैतिक फैसले लेने लगेंगे, तो क्या इंसान फैसले लेने की क्षमता खो देंगे? लुइसविले यूनिवर्सिटी के एआई सिद्धांतकार रोमन याम्पोल्सकी तर्क देते हैं कि सही-गलत का पैमाना हर देश, काल व परिस्थिति में बदलता रहता है। इसलिए, कंप्यूटर को ‘गुरु’ बना देना खतरनाक है, क्योंकि वह सिर्फ कोड समझता है, इंसानी भावना व बदलती दुनिया की पेचीदगियां नहीं। एआई को इंसानों की तरह संवेदनशील बनाने पर जोर प्रो. फ्लोरिडी कहते हैं,‘एआई कंपनियां दो दार्शनिक सिद्धांतों पर जंग लड़ रही हैं। पहला- कर्तव्यवाद जो सख्त नियमों पर आधारित है... कभी झूठ न बोलना या धोखा न देना। एंथ्रोपिक और इंफ्लेक्शन एआई इसी सिद्धांत पर चलते हैं, जिससे उनका एआई ज्यादा ईमानदार और इंसानों की मानसिक स्थिति के प्रति संवेदनशील बनता है। दूसरा- परिणाम आधारित सोच... यानी फैसले से होने वाले नफे-नुकसान को तौलना। चैटजीपीटी और जेमिनी इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। जैसे- वेमो की सेल्फ-ड्राइविंग कारें इसी सिद्धांत पर दुर्घटना की स्थिति में दिशा वही चुनती हैं, जिससे सबसे कम नुकसान या मौतें हों।
Sunil Gavaskar Statement on Rohit Sharma: रोहित शर्मा को लेकर सुनील गावस्कर ने बड़ा बयान दिया है. उनका कहना है कि इंग्लैंड के खिलाफ तीन मैचों की वनडे सीरीज में रोहित शर्मा के पास यह साबित करने का बड़ा मौका है कि वह अगले साल साउथ अफ्रीका में होने वाले वनडे वर्ल्ड कप में भारत के लिए ओपनिंग काने वाले हैं. गावस्कर ने कहा कि वनडे वर्ल्ड कप को लेकर उनकी क्या स्थिति है रोहित जानते हैं. Tue, 30 Jun 2026 00:07:15 +0530