पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। विधानसभा सचिवालय द्वारा लोक लेखा समिति (PAC) और सदन की तीन अन्य महत्वपूर्ण कमेटियों के लिए चुनाव प्रक्रिया की घोषणा करते ही सत्ताधारी दल के दो धड़े आमने-सामने आ गए हैं।
यह मुकाबला पारंपरिक रूप से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नहीं, बल्कि खुद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर छिड़ी वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है। आगामी 5 जुलाई को होने वाला यह गुप्त मतदान यह साफ संकेत दे देगा कि विधानसभा के भीतर वास्तव में किस गुट को सबसे ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल है।
असली टीएमसी पर दावेदारी और बागी गुट के तेवर ममता बनर्जी द्वारा 1998 में स्थापित की गई टीएमसी के इतिहास में यह पहली बार है जब पार्टी के भीतर से ही उनके नेतृत्व को इतनी बड़ी चुनौती मिली है। बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी चेयरपर्सन के पद से हटाने का दावा करते हुए वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को इस पद पर चुन लिया है।
ऋतब्रत गुट का दावा है कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 65 का समर्थन उनके पास है। इस दावे को सच साबित करने के लिए वे पीएसी चेयरमैन के पद पर अपने पसंदीदा सीनियर नेता फिरहाद हकीम को उतारने की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के खेमे ने भी अपनी तैयारी पुख्ता कर ली है और चुनाव अधिकारियों के सामने अपना दावा मजबूती से पेश किया है।
संसदीय परंपरा और चेयरमैन पद का कानूनी पेंच संसदीय लोकतंत्र में यह एक मजबूत परंपरा रही है कि लोक लेखा समिति (PAC) के अध्यक्ष का पद हमेशा मुख्य विपक्षी दल के सदस्य को दिया जाता है ताकि सरकारी खर्चों की जांच पूरी निष्पक्षता के साथ हो सके। हालांकि, यह कोई कानूनी बाध्यता नहीं बल्कि एक स्थापित प्रथा है।
पश्चिम बंगाल में इस पद को लेकर पहले भी कई बार विवाद हो चुके हैं, जहाँ पिछली सरकारों के दौरान बीजेपी ने परंपरा को दरकिनार करने का आरोप लगाते हुए शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बैठकों का बहिष्कार किया था। इस बार संकट यह है कि कागजों पर मुख्य विपक्षी दल कौन है, इसका फैसला होना बाकी है क्योंकि मामला अभी भी अदालत के विचाराधीन है।
5 जुलाई को विधानसभा के भीतर शक्ति प्रदर्शन विधानसभा की अधिसूचना के मुताबिक, पीएसी और अन्य समितियों के लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 30 जून तय की गई है। इसके बाद 1怀जुलाई को नामांकनों की जांच की जाएगी और 2 जुलाई तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे। यदि निर्धारित सीटों से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में रहते हैं, तो 5 जुलाई को मतदान कराया जाएगा।
यह चुनाव वास्तव में दोनों गुटों के लिए एक बड़ा लिटमस टेस्ट साबित होने वाला है, जहाँ दोनों पक्ष कमेटी की मेंबरशिप के लिए अपने-अपने उम्मीदवार उतारकर सदन के भीतर अपनी असली राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन करेंगे।
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