हल्दीघाटी की रणभूमि एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। मेवाड की मिट्टी में बसे उस गौरवगान को नया स्वर तब मिला, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने उदयपुर में आयोजित राष्ट्र चेतना संकल्प सभा में साफ शब्दों में कहा कि वर्ष 1576 का हल्दीघाटी युद्ध महाराणा प्रताप की विजय का प्रतीक था, लेकिन इतिहासकारों ने इस संघर्ष की वास्तविकता को दबाने का प्रयास किया। महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती और युद्ध की 450वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सहित अनेक जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
उधर, सोशल मीडिया पर भी मोहन भागवत के इस बयान के बाद बहस तेज हो गयी है। एक तरफ लोग महाराणा प्रताप को भारतीय स्वाभिमान, स्वतंत्रता और प्रतिरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बताते हुए हल्दीघाटी युद्ध को उनकी नैतिक और रणनीतिक विजय करार दे रहे हैं, तो दूसरी ओर कुछ लोग इतिहासकारों के पुराने दस्तावेजों और मुगल अभिलेखों का हवाला देकर अलग राय रख रहे हैं। अकबर बनाम महाराणा प्रताप की यह बहस सोशल मीडिया मंचों पर तेजी से फैल रही है, जहां इतिहास, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान को लेकर लोग अपने अपने विचार साझा कर रहे हैं। कई लोगों ने महाराणा प्रताप के संघर्ष और चेतक की वीरता को भारतीय अस्मिता का प्रतीक बताया, जबकि कुछ ने इतिहास को राजनीतिक नजरिये से देखने पर सवाल भी उठाए हैं।
जहां तक मोहन भागवत के संबोधन की बात है तो आपको बता दें कि उन्होंने अपने भाषण में केवल इतिहास की व्याख्या नहीं की, बल्कि उस सोच पर भी सवाल उठाया, जिसने सदियों तक महाराणा प्रताप के संघर्ष को सीमित रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने पूछा, “आज हम महाराणा प्रताप की जयंती मना रहे हैं, क्या कभी किसी ने अकबर की जयंती का ऐसा उत्सव सुना है?” इस प्रश्न के माध्यम से उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि जनता के हृदय में कौन जीवित है, इसका उत्तर इतिहास की पुस्तकों से अधिक समाज की स्मृति में मिलता है।
भागवत ने कहा कि यदि मुगल इतिहासकारों ने स्वयं यह लिखा कि प्रारंभिक हमले के बाद मुगल सेना को पीछे हटना पडा, तो फिर विजय किसकी मानी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी केवल दो सेनाओं का युद्ध नहीं था, बल्कि भारत की स्वतंत्र चेतना, स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का संघर्ष था। उन्होंने महाराणा प्रताप को ऐसे योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया, जिसने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद आत्मसमर्पण स्वीकार नहीं किया। भागवत ने कहा कि महाराणा प्रताप इस युद्ध में विजयी होकर उभरे थे। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन धर्म, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा का प्रतीक है। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि महाराणा प्रताप ने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि धर्म, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष किया। भागवत ने कहा, ‘‘महाराणा प्रताप ने अत्याचारों के खिलाफ, धर्म और संस्कृति के लिए तथा अपनी भूमि की स्वतंत्रता के लिए युद्ध किया।’’ आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए उन ऐतिहासिक महापुरुषों से सीख लेने की आवश्यकता है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और संकल्प पर अडिग रहकर संघर्ष किया।
संघ प्रमुख ने बप्पा रावल, ललितादित्य मुक्तापीड और राणा सांगा जैसे ऐतिहासिक योद्धाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का इतिहास पराधीनता का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का इतिहास रहा है। उन्होंने कहा, “जब भी कोई आक्रमणकारी इस भूमि पर आया, उसी दिन से उसे हटाने का प्रयास शुरू हो गया।”
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरोप लगाया कि देश और विदेश में भारत के उत्थान को रोकने के लिए झूठे विमर्श गढ़े जा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘आज भारत को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिशें हो रही हैं। झूठी खबरें फैलाई जा रही हैं और लोगों को गुमराह करने के लिए कई तरीके अपनाए जा रहे हैं।’’ आरएसएस प्रमुख ने कहा, ‘‘भारत के उत्थान का विरोध करने वाले लोग जनसंख्या, शक्ति, आर्थिक संसाधन और संगठनात्मक क्षमता रखते हैं, फिर भी हमें अपने मूल्यों के आधार पर दृढ़ रहना होगा।’’ भागवत ने राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक संकल्प का आह्वान किया। उन्होंने कहा, ‘‘वर्तमान चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें अपने आदर्शों और सभ्यतागत मूल्यों पर टिके रहना होगा।’’
भागवत ने कहा कि भारत की शक्ति केवल उसकी जनसंख्या या भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके सभ्यतागत मूल्यों में निहित है। उन्होंने लोगों से एकजुट रहने और संकीर्ण पहचान की सीमाओं से ऊपर उठने का आह्वान किया। भागवत ने कहा, ‘‘हमें उसी प्रकार एकजुट रहना चाहिए, जैसे मेवाड़ की जनता महाराणा प्रताप के साथ खड़ी रही थी। भारत की प्रगति के लिए हमें मिलकर कार्य करना होगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘विभिन्न आक्रमणकारी आए, कुछ ने सत्ता भी प्राप्त की, लेकिन भारत ने सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर कभी भी गुलामी को स्वीकार नहीं किया। इतिहास के कठिन दौर में भी भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखा। हमने अच्छे और बुरे दोनों समय देखे हैं, लेकिन हमारा धर्म और हमारी संस्कृति अक्षुण्ण बनी रही।’’ भागवत ने कहा कि भारत का उत्थान केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि विश्व के कल्याण के लिए भी महत्वपूर्ण है और एक सशक्त भारत दुनिया के लिए भी आवश्यक है।
हम आपको यह भी बता दें कि राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी महाराणा प्रताप पर्यटन परिपथ योजना भी चर्चा में है। प्रस्तावित परिपथ में कुंभलगढ़ किला, हल्दीघाटी का युद्धस्थल, गोगुंदा, चावंड, चित्तौडगढ़, देवर और उदयपुर जैसे ऐतिहासिक स्थलों को जोड़ने की योजना है। इस परियोजना का उद्देश्य केवल पर्यटन बढ़ाना नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप के संघर्ष को नई पीढ़ी तक जीवंत रूप में पहुंचाना भी है।
उल्लेखनीय है कि हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में है, जिसने पराजय और विजय की पारंपरिक परिभाषाओं को चुनौती दी। 18 जून 1576 को अरावली की संकरी घाटियों में लड़ा गया यह युद्ध केवल सैन्य शक्ति का टकराव नहीं था। एक ओर मुगल सेना थी, जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे, जबकि दूसरी ओर मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए संकल्पित महाराणा प्रताप थे। संख्या में कम होने के बावजूद महाराणा प्रताप ने ऐसा प्रतिरोध खड़ा किया कि सदियों बाद भी हल्दीघाटी वीरता का पर्याय बनी हुई है।
इस युद्ध की सबसे मार्मिक स्मृतियों में चेतक नामक अश्व का बलिदान आज भी अमर है। घायल होने के बावजूद चेतक ने अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया और फिर प्राण त्याग दिए। हल्दीघाटी की पीली मिट्टी, चेतक की छलांग और महाराणा प्रताप का अदम्य संकल्प आज भी उस युग की गूंज सुनाते हैं।
आज जब हल्दीघाटी की 450वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, तब यह केवल इतिहास का उत्सव नहीं, बल्कि उस चेतना का पुनर्जागरण है जो स्वाभिमान, संघर्ष और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का संदेश देती है। इतिहास की बहसें चलती रहेंगी, लेकिन यह सत्य अटल है कि महाराणा प्रताप भारतीय जनमानस में केवल एक राजा नहीं, बल्कि अदम्य प्रतिरोध और स्वाभिमान के अमर प्रतीक के रूप में विराजमान हैं।
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