अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते जिस समय पूरे विश्व के सामने ऊर्जा संकट व मंहगाई सुरसा राक्षसी की तरह मूंह खोलकर के देश की दौलत को निगलने के लिए खड़ी है, उस दौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डीजल व पेट्रोल को बचाने व सोना ना खरीदने की सभी देशवासियों से अपील की है, क्योंकि मोदी की इस अपील पर अमल करने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला बोझ कम से कम कुछ तो कम होगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर होने का अवसर भी मिलेगा। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की इस अपील के बाद से ही देश के विभिन्न हिस्सों में मोदी के द्वारा चलाई जा रही इस राष्ट्रहित की मुहिम में शामिल होने की होड़ लग गई है। हालांकि अभी तो अधिकतर लोग सांकेतिक रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस मुहिम में ज्यादा जुड़ रहे हैं, लेकिन सांकेतिक ही सही एक बहुत अच्छी पहल में कम से कम लोगों के जुड़ने की शुरुआत तो हुई और आने वाले दिनों में उम्मीद है कि इस पहल पर बड़े पैमाने पर आम लोग भी अमल करेंगे।
वैसे तो देशभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद से ही यह मुहिम धरातल पर धीरे-धीरे रंग लाती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद से ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर के आम कार्यकर्ताओं तक ने सर्वप्रथम बड़े पैमाने पर इस मुहिम में शामिल होकर के इसको एक आंदोलन का रूप देने का कार्य किया। जिसके बाद से ही देश भर में ज्यूडिशियरी, शीर्ष नौकरशाह, कर्मचारी व आम जनमानस तक भी मोदी की इस मुहिम में अब बड़े पैमाने पर शामिल होते हुए नज़र आ रहे हैं। शासन-प्रशासन के शीर्ष स्तर पर काबिज बैठे हुए ताकतवर लोगों में देश भर में वाहनों के लंबे-चौड़े काफिले का त्याग करने की फिलहाल तो एक होड़ लगी हुई है। हालांकि उन लोगों का यह कदम वास्तव में दिल से खर्चों में कटौती करते हुए जीवन में सादगी अपनाने की धरातल पर एक स्थाई पहल है या सिर्फ मीडिया व सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर अपनी कुछ पोस्ट डालकर के वाहवाही लूटने की एक नौटंकी मात्र है, यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा। लेकिन अच्छी बात यह है कि कम से कम युद्ध के माहौल के चलते जब पूरी दुनिया ऊर्जा व आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ी है, उस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस अपील पर भारत में धरातल पर अमल शुरू होना देश व समाज हित के लिए एक बहुत अच्छा संकेत है।
लेकिन विचारणीय तथ्य यह भी है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह मुहिम कुछ समय की ना होकर के देश व समाज हित में धरातल पर दीर्घकालीन स्थाई रूप ले पायेगी, हालांकि यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा। लेकिन पूरी दुनिया में जिस तरह से युद्धों के चलते बेहद ही तनावपूर्ण माहौल चल रहा है, उस माहौल का स्पष्ट रूप से संदेश है कि अब वह दौर आ गया है जब देश व समाज के हित में जनता के टैक्स के पैसे के दम पर राजा-महाराजाओं की तरह पूरी शानो-शौकत व ठाट-बाट से जीवन व्यतीत कर रहे शासन-प्रशासन के लोग सादगी से जीवनयापन करने की आम जनमानस के सामने नज़ीर पेश करते हुए लोगों को भी "सादा जीवन उच्च विचार" के लिए प्रेरित करें। वैसे भी देखा जाए तो अब देश व दुनिया में वह दौर शुरू हो गया है, जब देश व समाज के हित की बातें सिर्फ और सिर्फ सरकारी दफ्तरों में बैठकर के आम जनमानस पर अपने विचार या नियम-कानून बना कर के थोप देने मात्र से ही पूरी नहीं हो जाती है, बल्कि उस पर अमल करवाने के लिए शासन-प्रशासन में बैठे हुए ताकतवर लोगों को भी स्वयं अनुशासित होकर के जीवन पथ पर सादगी व जवाबदेही को अपनाकर उदाहरण पेश करना चाहिए, तब ही आम जनमानस भी उन लोगों की देखा-देखी उस पर अमल करने का कार्य करेगा। लेकिन आज के वीवीआईपी बनकर के दिखाने वाले दौर में जिस तरह के राजसी ठाट-बाट के साथ कुछ राजनेताओं व शासन-प्रशासन में बैठे हुए कुछ लोग सरकारी व निजी दौरों के दौरान अनाप-शनाप खर्चा करते हैं, क्या ऐसे लोग के द्वारा देश व समाज हित में उन सभी अनावश्यक खर्चों में स्वयं ही कटौती करने की पहल करके जनता के सामने एक बड़ी मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए।
विचारणीय तथ्य यह भी है कि आजकल देश में जिस तरह से सरकारी या गैरसरकारी लोगों के मन में अपने आपको एक बड़ा वीवीआईपी दिखाने की चाह रहती है, वह चाहते देश व समाज हित में ठीक नहीं है, क्योंकि इन लोगों को वीवीआईपी दिखाने की चाहत में सिस्टम का बड़ा तामझाम, लग्जरी मंहगी गाड़ियों के लंबे-चौड़े काफिले, चार्टर प्लेन आदि दिखावे पर जनता के द्वारा देश के विकास के लिए दिये गये टैक्स की काफी धनराशि का दुरुपयोग होता है, जिसको तत्काल रोका जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों के द्वारा अपना भौकाल बनाने के लिए व दिखावे के लिए ली गयी अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव में होने वाले अतिरिक्त खर्चों को भी अब बिल्कुल सीमित करना चाहिए। क्योंकि जिस तरह से चंद लोग सिस्टम में बैठे कुछ ताकतवर लोगों की कृपा से सरकारी अमले की आड़ में जनता के टैक्स के पैसों पर मौज मस्ती करते हुए जनता का ही आये दिन उत्पीड़न करते हैं, यह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है, सिस्टम में बैठे हुए कुछ लोगों से सांठ-गांठ करके हमारे प्यारे देश में धनपशु, दलाल व अपराधी तक भी सरकारी सुरक्षा व सुविधाओं के भौकाल का आनंद लें रहे हैं, जो नियम कायदे व कानून पसंद देशभक्त देशवासियों के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है। देश व समाज हित में जनता के द्वारा टैक्स के रूप में दी गई धनराशि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, युवाओं, महिलाओं, किसानों और उधोग-धंधों आदि के साथ-साथ देश के सर्वांगीण विकास पर खर्च हो। देश की जनता के टैक्स का धन देश के विकास और आम जनमानस की भलाई में लगे, न कि वीवीआईपी बनने की चाहत के बेफिजूल के खर्चो और शानो-शौकत में लगे। इसलिए अब देश व समाज हित में वह समय आ गया है जब शासन व प्रशासन में बैठे लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोना ना खरीदने व डीजल और पेट्रोल बचाने की पहल को दो कदम आगे बढ़ाते हुए स्वयं ही अनुशासित होकर के जीवन पथ पर सरलता व सादगी अपनाकर देश व समाज हित को सर्वोपरि रखते हुए कार्य करेंगें और भारत का नव निर्माण करते हुए देश को विश्व गुरु बनायेंगे।
- दीपक कुमार त्यागी
अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक
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बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-
पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती बल्कि पार्टी ने बिहार में अपना सूझबूझ युक्त स्वतंत्र नेतृत्व स्थापित कर दिया।
पार्टी मामलों के जानकारों की मानें तो अब सम्राट चौधरी को केवल अंतरिम चेहरा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नेतृत्व के मोहरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो ओबीसी सियासत के लिए सौभाग्य की बात है। चूंकि उनमें सामाजिक न्याय के सूत्रधार लालू प्रसाद वाली हाजिर जवाबी, सुशासन बाबू नीतीश कुमार वाली सियासी चतुराई के अलावा सद्भावी कैलाशपति मिश्रा वाली सूझबूझ भी भरी हुई है जिससे हरेक जाति-धर्म के लोगों में उनकी स्वीकार्यता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।
दूसरा, सामाजिक समीकरणों में मजबूत पकड़: बिहार की राजनीति के भाजपाई नव चाणक्य सम्राट चौधरी का सबसे बड़ा राजनीतिक बल उनका व्यापक सामाजिक आधार माना जाता है। चूंकि वे पिछड़े वर्ग, विशेषकर कुशवाहा-कोइरी यानी लव कुश समाज या त्रिवेणी संघ से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखता है। इससे भाजपा को लालू प्रसाद/नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के बीच यादव बनाम गैर-यादव ओबीसी राजनीति में बढ़त मिली ही, साथ ही ग्रामीण वोटबैंक में विस्तार आया, और मंडल राजनीति का नया जवाब देने का अवसर मिला।
चूंकि भाजपा लंबे समय से बिहार में एक ऐसा चेहरा खोज रही थी जो हिंदुत्व, ओबीसी राजनीति, और संगठनात्मक निष्ठा तीनों को एक साथ लेकर चल सके। लिहाजा सम्राट चौधरी उस समीकरण में फिट बैठते दिखे। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, वैश्य, दलितों के साथ-साथ प्रगतिशील यादवों पर भी पूरी पकड़ है, जिसका फायदा भाजपा नीत एनडीए को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में उन्होंने दिलवाया और पुरस्कार स्वरूप पहले गृहमंत्री, फिर मुख्यमंत्री बने।
तीसरा, व्यवहारिक आक्रामक भरा लेकिन नियंत्रित राजनीतिक शैली: राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि सम्राट चौधरी की राजनीति, तेजस्वी यादव की तरह ही पलटवारी आक्रामक, लेकिन संगठन के प्रति अनुशासित मानी जाती है। वे सड़क से लेकर सदन तक मुखर सियासी शैली अपनाते रहे हैं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा पैदा हुई। भाजपा नेतृत्व अक्सर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाता है जो जनसभाओं में भीड़ खींच सकें, विपक्ष पर हमला कर सकें, और संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहें। ये सभी गुण सम्राट चौधरी में कूट कूट कर भरे हुए हैं। इसलिए उनका सियासी उदय पूर्वी भारत की राजनीति में अहम मायने रखती है।
चौथा, दिल्ली नेतृत्व का भरोसा: भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति में “विश्वसनीय नेतृत्व” बहुत महत्व रखता है। चूंकि सम्राट चौधरी इन कसौटियों पर भी खरे उतरते हैं, इसलिए उनपर सबका भरोसा बढ़ा है। वाकई सम्राट चौधरी जमीनी संगठन से निकले नेता हैं, जो भाजपा की स्थापित लाइन से थोड़ा-सा भी विचलित नहीं होते, और गठबंधन राजनीति को भी संभालने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के समय उनके नाम पर सहमति बनी। इससे भाजपा की सूबाई राजनीति को एक नई धार मिली है।
पांचवां, सूबाई चाणक्य नीतीश युग के बाद की राजनीति का केंद्र बना सम्राट युग: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद बिहार में नेतृत्व का संक्रमण होना तय माना जा रहा था। ऐसे विचित्र समय में भी भाजपा ने युवा, ओबीसी, और आक्रामक राजनीतिक छवि वाले नेता के रूप में सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है। इसका उद्देश्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि अगले 10–15 वर्षों का राष्ट्रवादी राजनीतिक आधार तैयार करना भी माना जा रहा है। पार्टी की इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के प्रति सम्राट चौधरी ने भी प्रतिबद्धता दिखाई है।
छठा, सत्ताप्रतिष्ठान की राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं: हालाँकि सम्राट चौधरी के सामने कतिपय बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिसमें बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य, जातीय संतुलन, और गठबंधन राजनीति के प्रबंधन में सम्राट चौधरी निरंतर सधी चाल चल रहे हैं और अहम फैसले ले रहे हैं। इससे बिहार वासियों के दिलोदिमाग पर सकारात्मक असर पड़ा है। भले ही सियासी ईर्ष्यावश विपक्ष लगातार उनकी सरकार को अपराध और प्रशासनिक मुद्दों पर घेर रहा है। लेकिन सम्राट चौधरी लगातार विकास,
रोजगार, और प्रशासनिक सुधार पर ठोस परिणाम देते ।नजर आते हैं, इसलिए सूबे में “भविष्य के नेता” वाली उनकी छवि स्थायी बनती जा रही है।
सातवां, बिहार की नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता: सम्राट चौधरी का उदय केवल व्यक्ति विशेष का उत्थान नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में तीन बड़े परिवर्तनों का संकेत माना जा रहा है: पहला, भाजपा का स्वतंत्र प्रभुत्व, दूसरा, ओबीसी नेतृत्व का नया संस्करण, और तीसरा, पोस्ट-नीतीश युग की शुरुआत। चूंकि इस नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता खुद सम्राट चौधरी ही हैं, इसीलिए समर्थक उन्हें “बिहार का वर्तमान और भविष्य” दोनों कह रहे हैं। उनकी तमाम कोशिशें भी इसी ओर इंगित करती दिखाई देती हैं। इसलिए हर ओर उल्लास की स्थिति देखी जा रही है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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