भारत दौर पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग होते हैं। हम इन्हें गंभीरता से लेंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका में भी बेवकूफ लोग मौजूद हैं। 'क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग' (क्वाड) की बैठक में शिरकत करने राजधानी दिल्ली में आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अमरीका में भारतीयों पर नस्लीय हमलों को लेकर यह जवाब दिया।
रुबियो ने कहा कि मैं नस्लभेदी कमेंट्स को बहुत गंभीरता से लूंगा। मुझे यकीन है कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने ऑनलाइन और दूसरी जगहों पर कमेंट्स किए हैं, क्योंकि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग मौजूद होते हैं। मुझे यकीन है कि यहां भी बेवकूफ लोग हैं, यूनाइटेड स्टेट्स में भी बेवकूफ लोग हैं जो हर समय बेवकूफी भरे कमेंट्स करते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स एक बहुत ही वेलकमिंग देश है। दुनिया भर से हमारे देश में आने वाले लोगों से फायदा हुआ है।
अमरीकी विदेश मंत्री को शायद अंदाजा होगा कि नस्लवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद भारत के अभिन्न अंग हैं। इन मुद्दों पर राजनीतिक करके देश को कमजोर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने में भारत के राजनीतिक दल ही सबसे आगे हैं। इसमें चाहे विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, कोई भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को भुनाने में पीछे नहीं रहता। सत्ता में जो भी राजनीतिक दल होता है, वह यंत्रणा और क्रूरता को कानूनी आड़ में जायज ठहराने का प्रयास करता है। इसका देश में सबसे बड़ा उदाहरण है पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें।
अमरीका में एक अश्वेत युवक की पुलिसकर्मियों ने हत्या कर दी थी। इससे पूरे अमरीका में बवाल मच गया था। 25 मई 2020 को मिनियापोलिस शहर में 'डेरेक शॉविन' नामक एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने जॉर्ज फ्लॉयड नाम के निहत्थे अश्वेत व्यक्ति की गर्दन पर लगभग 9 मिनट तक अपना घुटना दबाए रखा था, जिससे दम घुटने से उनकी मौत हो गई थी। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद "ब्लैक लाइव्स मैटर" आंदोलन के तहत अमेरिका के सभी 50 राज्यों में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए। आरोपी पुलिस अधिकारी को हत्या का दोषी ठहराया गया और 2021 में उसे 22.5 साल की जेल की सजा सुनाई गई।
इसके विपरीत भारत में पुलिस हिरासत में मौतें साधारण घटनाओं में शुमार है। सरकारी तंत्र को ऐसी मौतों से खास फर्क नहीं पड़ता। सरकार ऐसी मौतों को कभी गंभीरता से नहीं लेती। कारण साफ है ऐसी मौतों में कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सत्तातंत्र जिम्मेदार होता है। यही वजह है कि हिरासत में मौतों जैसे बेहद अमानवीय और संवदेनशील मुद्दे पर भी सरकारें खामोश रहती हैं। विपक्ष जरूर कुछ शोर मचाता है, किन्तु विपक्ष जब सत्ता में रहा होता है, तब भी ऐसी मौतें होती रही हैं, इसलिए सत्ता पक्ष द्वारा गढ़े मुर्दे उखाड़े जाने के भय विपक्ष प्राय: चुप्पी ही साधे रहता है।
अदालतों ने भारत में पुलिस हिरासत में मौतें रोकने के प्रयास किए हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाई। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में होने वाली हिंसा को व्यवस्था पर धब्बा बताया था। ऐसी मौतों के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट का सख़्त सवाल पूछा था कि क्या केंद्र सरकार हमें हल्के में ले रही है? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं। "शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करने के दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ यह सख्त टिप्पणी की थी।
हिरासत में मौतों पर अपवादस्वरूप ही दोषी पुलिसकर्मियों को अदालतों से सजा मिल पाती है। अप्रैल 2026 में, एक ऐतिहासिक और दुर्लभतम फैसले में मदुरै की एक अदालत ने वर्ष 2020 में पुलिस हिरासत में एक पिता (पी. जयराज) और पुत्र (जे. बेनिक्स) की बेरहमी से हत्या करने के मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई। जबकि अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव या गवाहों के मुकरने के कारण पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराना मुश्किल होता है, जिसके चलते कई मामलों में पुलिसकर्मियों को केवल विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ता है या वे बरी हो जाते हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार वर्ष 2024 में 2,739 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। हिरासत में यातना सत्ता तंत्र की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों का घोर दुरुपयोग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिरासत में रखे गए लोग कमजोर और
असुरक्षित स्थिति में होते हैं और वहाँ शक्ति का संतुलन भी उनके खिलाफ होता है। जवाबदेही तय करने की स्वतंत्र जांच नहीं हो पाती है, क्योंकि हिरासत में हुई मौतों की जांच अक्सर उसी पुलिस विभाग द्वारा की जाती है, जिनके संरक्षण में ऐसी घटना घटित होती है। यातना के उपयोग को पुलिस बल के भीतर हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देने से जोड़ा गया है।
भारत में यातना (टॉर्चर) को रोकने या उससे निपटने के लिए अब तक कोई विशेष, स्वतंत्र कानून नहीं बन पाया है। यद्यपि भारत ने 1997 में 'संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी सम्मेलन' पर हस्ताक्षर किए थे,लेकिन वर्तमान में यातना से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता और भारतीय संविधान के प्रावधानों का ही उपयोग किया जाता है। यातना निवारण विधेयक 2010 में लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन की पुष्टि करना और यातना को स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध बनाना था। हालाँकि, प्रवर समिति को भेजे जाने और संशोधनों की सिफारिशों के बाद, यह विधेयक लैप्स हो गया और कानून का रूप नहीं ले सका।
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि भारत में हर साल सैकड़ों लोग हिरासत में मारे जाते हैं। उनका कहना है कि संदिग्धों से जबरन कबूलनामा निकलवाने के लिए यातना और दुर्व्यवहार करना पुलिसिंग का हिस्सा बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों ने भारत से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप पुलिस व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए बड़े सुधार करने का आह्वान किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब हिरासत में मौतों को लेकर देश की सरकारों को खास फर्क नहीं पड़ता, तब अमरीकी विदेश मंत्री को अमरीका में मौजूद मामूली से नस्लवाद को लेकर शर्मिंदा होना देश के नेताओं को आईना दिखाने जैसा है।
- योगेन्द्र योगी
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बदलती जलवायु के कारण भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में है। अब यह संकट पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर तटीय इलाकों तक फैल चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, घटती हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते निर्माण से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर से लेकर दिल्ली की गलियों और विदर्भ के मैदानों तक पारा 45 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है। यह केवल बढ़ते तापमान का आंकड़ा नहीं है बल्कि यह एक गहराता सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक चेतावनी है। हीट वेव अब केवल मौसमी असुविधा नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव अस्तित्व के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। बढ़ते तापमान, घटती हरियाली और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने जीवन को लू की लपटों में समेट दिया है।
मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि हीट वेव अब केवल अपने पारंपरिक गढ़ (उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत) तक सीमित नहीं रही बल्कि इसने दक्षिण भारत के उन तटीय इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जो ऐतिहासिक रूप से कम ताप प्रभावित रहते थे। अध्ययन बताते हैं कि 1981 से 2000 के बीच लू की औसत अवधि जहां 2.5 से 5.5 दिन थी, वहीं 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 8.5 दिन तक पहुंच गई। लू का भौगोलिक दायरा भी 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर से फैलकर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है। यह विस्तार बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कड़वी हकीकत है। हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे मुक्त करते हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव पैदा होता है। इस तपती आग में सबसे अधिक जोखिम उन लोगों (रेहड़ी-पटरी वाले, निर्माण श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर) का है, जो खुले आसमान के नीचे अपना वजूद तलाशते हैं। इनके पास न तो कूलिंग सेंटर की सुविधा है और न ही काम के घंटों में लचीलापन। इसके साथ ही बच्चे और बुजुर्ग इस बढ़ते ‘डिस्कंफर्ट इंडेक्स’ के सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में वृद्धि से आगामी वर्षों में हीट वेव, गर्मी का मौसम ज्यादा समय तक रहने और सर्दी के मौसम का समय घटने जैसी स्थितियां पैदा होंगी। इस बारे में वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि जिस जलवायु परिवर्तन के बारे में अब तक हम केवल पढ़ते-सुनते रहे थे, वह अब हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। भारत में मई का महीना गर्म हवाओं (लू) का चरम समय होता है और लू की घटनाओं को भी मौसम में दिन-प्रतिदिन बदलाव का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है लेकिन चिंता की बात यही है कि लू की तीव्रता लगातार वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में 2009, 2010, 2016, 2017 और 2022 भारत में रिकॉर्ड किए गए पांच सबसे गर्म वर्ष रहे। आईएमडी के मुताबिक 15 सबसे गर्म वर्षों में से 11 वर्ष 2008 से 2022 के बीच ही दर्ज किए गए।
यह जानना भी जरूरी कि हीट वेव आखिर है क्या? जैसा कि नाम से ही जाहिर है, हीट वेव अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि है, जो प्रायः दो या ज्यादा दिनों तक रहती है। जब तापमान किसी क्षेत्र के सामान्य औसत तापमान से अधिक हो जाता है तो उसे ‘हीट वेव’ कहा जाता हं। आईएमडी के अनुसार मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान जब 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो लू चलने लगती है और यदि तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो यह खतरनाक लू की श्रेणी में कही जाती है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस हो जाता है तो लू चलने लगती है। हीट वेव के कारण लोगों के बीमार होने और हीट स्ट्रोक का खतरा बहुत बढ़ जाता है तथा सैंकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1998 से 2017 के बीच हीट वेव के कारण 1.66 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और यह आंकड़ा अब वर्ष दर वर्ष तेजी से बढ़ रहा है।
आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तापमान में वृद्धि तथा लू का मानव शरीर पर व्यापक असर पड़ रहा है। गर्म हवाओं से ब्रेन स्ट्रोक, हृदयाघात, नसों में खून के थक्के जमने की आशंका, स्थायी विकलांगता का खतरा बढ़ जाता है और इससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, हीट वेव बाढ़ के बाद दूसरी सबसे घातक आपदा है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर रही है। लू का असर हृदय तथा फेफड़े जैसे अंगों पर सर्वाधिक पड़ता है, जो बेहद खतरनाक हो सकता है। हीट वेव से ऐसे लोगों की स्थिति और खराब होने की संभावना होती है, जो हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी इत्यादि समस्याओं से पीड़ित हैं। आईएमडी के मुताबिक वैसे तो हर साल दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना इत्यादि उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य, पूर्व और उत्तर प्रायद्वीपीय भारत के मैदानी इलाकों में मार्च से जून के दौरान हीट वेव का दौर चलता है लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वी की जलवायु गर्म होती जा रही है, दिन और रात भी सामान्य से अधिक गर्म होते जा रहे हैं, जिससे हीट वेव की घटनाएं बढ़ रही हैं और मौतों तथा बीमारियों की आशंका भी बढ़ रही है।
प्रश्न यह है कि भारत में हीट वेव को लेकर ऐसी स्थिति क्यों निर्मित हो रही है? पिछले 30 वर्षों के तापमान तथा गर्म हवाओं का आकलन करते हुए आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया था कि घटती हरियाली, शहरीकरण तथा कंक्रीट से निर्माण के कारण ही अब प्रतिवर्ष हीट वेव में वृद्धि हो रही है। प्रायः देखा जाता है कि एक ही शहर में कुछ जगहों पर उच्च तापमान दर्ज किया जाता है तो कुछ जगहों पर तापमान कम रहता है। कुछ स्थानीय कारण इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। दरअसल अधिक हरे-भरे इलाकों में तापमान कम दर्ज किया जाता है जबकि चारों ओर बसी कालोनियों तथा ऊंची-ऊंची इमारतों वाले इलाकों में तापमान ज्यादा दर्ज होता है। तकनीकी भाषा में इसे ‘अर्बन हीट आईलैंड इफैक्ट’ कहा जाता है। पेड़-पौधों की कमी, अधिक शहरीकरण तथा कंक्रीट से अधिक निर्माण इत्यादि विविध कारणों से शहर ज्यादा तप रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह शहरों में निरन्तर बढ़ता जनसंख्या घनत्व भी है। जनसंख्या का घनत्व बढ़ते जाने से हरियाली नष्ट हो रही है और शहरों में हरे-भरे प्राकृतिक क्षेत्रों को भी सीमेंट तथा कंक्रीट के तपते जंगलों में तब्दील किया जा रहा है। दुनियाभर में विभिन्न शोधों के आधार पर वैज्ञानिक जलवायु संकट को ही लू के लिए जिम्मेदार मान रहे है, जिनका कहना है कि शहरीकरण तथा जनसंख्या घनत्व इसमें बड़ा योगदान देते हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक लू से अर्थव्यवस्था को चौतरफा नुकसान होता है। डब्ल्यूएमओ का कहना है कि बढ़ते तापमान का अर्थ हीट वेव का बढ़ना, बहुत ज्यादा मात्रा में बर्फ का पिघलना, समुद्र जलस्तर का बढ़ना तथा मौसम की चरम घटनाओं का और ज्यादा विनाशकारी होना है, जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास पर पड़ेगा। इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में लगभग सभी साल पिछले तथा इस दशक से ही रहे हैं। ब्रिटिश मौसम कार्यालय के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि यदि जलवायु पविर्तन नहीं हो रहा होता तो ऐसा चरम तापमान प्रत्येक 312 वर्षों में एक बार ही देखने को मिलता। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत और पाकिस्तान में हर तीन साल बाद प्रचण्ड लू की आशंका जताते हुए दावा किया कि जलवायु परिवर्तन गर्मी की तीव्रता को जिस तेजी से बढ़ा रहा है, उससे इन क्षेत्रों के लोगों को आने वाले वर्षों में सौ गुना ज्यादा लू के थपेड़े झेलने पड़ सकते हैं।
बहरहाल, अत्यधिक तापमान से जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों की चिंता बढ़ जाती है, वहीं हीट वेव का श्रमिकों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है, जिससे देश की समग्र अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अत्यधिक गर्मी के कारण करीब 101 अरब घंटे खो देता है, जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक है और 3.5 करोड़ लोगों द्वारा एक वर्ष में 8 घंटे कार्य करने वाले लोगों द्वारा किए गए कार्य के बराबर है। आईएलओ की रिपोर्ट में भीषण गर्मी तथा लू के कारण 2030 तक दुनियाभर में अर्थव्यवस्था को 4.2 ट्रिलियन डॉलर की क्षति का अनुमान लगाया गया है। भारत के संदर्भ में इम्पीरियल कॉलेज में जलवायु विज्ञान के सीनियर लेक्चरर डॉ. फ्रेडरिक औटो कहते हैं कि भारत में मौजूदा गर्म हवाओं का एक बड़ा कारण कोयला तथा अन्य जीवाश्म ईंधन का जलाया जाना है और जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बंद नहीं होगा, तब तक भारत तथा अन्य स्थानों पर हीट वेव और भी गर्म व खतरनाक होती जाएगी। इन घातक स्थितियों से बचने के लिए जलवायु संकट से निपटने के अन्य उपायों के अलावा प्राकृतिक जंगलों के संरक्षण तथा आवासीय इलाकों में भी हरियाली बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण अभियान को भी बढ़ावा देना होगा।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार तथा पर्यावरण पर ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)
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