5 दिग्गज खिलाड़ी जो आईपीएल 2026 के बाद ले सकते हैं संन्यास, महेंद्र सिंह धोनी भी लिस्ट में शामिल
इंडियन प्रीमियर लीग 2026 का सीजन खत्म होने के बाद 10 टीमों में से 5 ऐसे खिलाड़ी हैं जो संन्यास की घोषणा कर सकते हैं. इस लिस्ट में चेन्नई सुपर किंग्स के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का नाम भी शामिल है. ईशांत शर्मा का करियर भी अब खत्म ही माना जा रहा है.
झारखंड में नवजातों की सेहत में बड़ा सुधार, 29 से घटकर 27 हुई मृत्यु दर; आ गई रिपोर्ट
Jharkhand News: झारखंड से शिशु स्वास्थ्य और पोषण को लेकर एक बेहद राहत देने वाली खबर सामने आई है. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा जारी किए गए सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस की ताजा रिपोर्ट में राज्य के लिए सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्षों की तुलना में इस बार राज्य में शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आई है. यह गिरावट साफ तौर पर दर्शाती है कि जमीन पर शिशुओं के पोषण और उनकी चिकित्सा व्यवस्था को लेकर बेहतर काम किया गया है. सरकारी स्तर पर चलाई जा रही स्वास्थ्य योजनाओं का असर अब दिखने लगा है, जिससे नवजातों के जीवन को सुरक्षित करने में मदद मिली है. हालांकि, इस सुखद बदलाव के बीच एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि ग्रामीण और शहरी इलाकों के स्वास्थ्य स्तर में अब भी एक बड़ा अंतर मौजूद है, जिसे पाटना बेहद जरूरी है.
क्या कहती है ताजा रिपोर्ट?
इस रिपोर्ट के आंकड़ों को अगर गहराई से समझा जाए तो शिशु मृत्यु दर का मतलब प्रति एक हजार जीवित जन्म पर एक वर्ष के भीतर होने वाली बच्चों की मौत से होता है. ताजा सर्वे के नतीजों से पता चलता है कि झारखंड ने पिछले आंकड़ों के मुकाबले अपने प्रदर्शन में दो पायदान का सुधार किया है. राज्य में अब यह शिशु मृत्यु दर 29 से घटकर 27 के स्तर पर पहुंच गई है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार छोटा जरूर लग सकता है, लेकिन यह हजारों मासूमों की जान बचने और स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ होने का सीधा प्रमाण है. प्रसव के समय मिलने वाली सहूलियतों और टीकाकरण के अभियानों ने इस आंकड़े को सुधारने में बड़ी भूमिका निभाई है.
गांव और शहर के बीच का अंतर
स्वास्थ्य के मोर्चे पर मिली इस कामयाबी के बाद भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच का बड़ा अंतर नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर 31 से घटकर केवल 29 तक ही पहुंच सकी है. इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों की बात करें तो वहां यह दर 21 से सीधे गिरकर 18 पर आ गई है. इन आंकड़ों से साफ है कि ग्रामीण इलाकों के मुकाबले शहरों में सुधार की रफ्तार काफी तेज रही है. शहरों में अस्पतालों की बेहतर पहुंच और जागरूकता का फायदा बच्चों को मिल रहा है. यह स्थिति बताती है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही शिशु कल्याण योजनाओं को अभी गांवों के आखिरी छोर तक पहुंचाने के लिए और ज्यादा मेहनत और संसाधनों की आवश्यकता है.
क्या है शिशु मृत्यु दर की स्थिति-
| इंडीकेटर (Indicator) | एसआरएस-2023 (वर्ष 2025) | एसआरएस-2024 (वर्ष 2026) | सुधार (कमी) |
| कुल शिशु मृत्यु दर | 29 | 27 | -2 |
| ग्रामीण शिशु मृत्यु दर | 31 | 29 | -2 |
| शहरी शिशु मृत्यु दर | 21 | 18 | -3 |
बेटे और बेटियों के स्वास्थ्य में असमानता
इस रिपोर्ट का एक और पहलू सामाजिक सोच और चिकित्सा व्यवस्था की सजगता पर सवाल उठाता है. राज्य में शिशु स्वास्थ्य के मामले में लैंगिक असमानता यानी लड़के और लड़कियों के बीच का अंतर अभी भी बरकरार है. आंकड़ों के मुताबिक लड़कों में शिशु मृत्यु दर जहां 26 है, वहीं लड़कियों के मामले में यह आंकड़ा 27 पर बना हुआ है. ग्रामीण इलाकों में भी लड़कों की तुलना में लड़कियों की मृत्यु दर अधिक देखी गई है. राहत की बात केवल इतनी है कि शहरी क्षेत्रों में लड़कियों की स्थिति काफी बेहतर दर्ज की गई है. यह असमानता बताती है कि बेटियों के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल को लेकर समाज में अभी और अधिक जागरूकता फैलाने की जरूरत है.
ये है लैंगिक स्थिति-
| क्षेत्र | कुल (Total) | पुरुष (Male) | महिला (Female) |
| झारखंड (कुल) | 27 | 26 | 27 |
| ग्रामीण (Rural) | 29 | 28 | 30 |
| शहरी (Urban) | 18 | 21 | 16 |
एक दशक का सफर और चुनौतियां
अगर हम लंबे समय के आंकड़ों पर नजर डालें तो झारखंड ने पिछले एक दशक में शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में करीब 27.8 प्रतिशत का शानदार सुधार दर्ज किया है. एक समय राज्य में शिशु मृत्यु दर का अनुमान 37.4 प्रतिशत के आसपास लगाया गया था, जो अब घटकर 27 पर आ चुका है. हालांकि, जब हम इसकी तुलना राष्ट्रीय औसत से करते हैं तो पता चलता है कि पूरे देश में इस दौरान सुधार की रफ्तार और तेज रही है. देश स्तर पर एक दशक में शिशु मृत्यु दर में 37.4 प्रतिशत की गिरावट आई है और राष्ट्रीय आंकड़ा 40.6 से घटकर 25.4 पर पहुंच गया है. झारखंड को राष्ट्रीय औसत के बराबर आने के लिए अभी अपने ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को और मजबूत करना होगा.
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