कभी साधारण सेवक थे, अब पद्मश्री से होंगे सम्मानित, जानें जनार्दन बापुराव बोथे की कहानी
महाराष्ट्र के 86 वर्षीय समाजसेवक और शिक्षाविद जनार्दन बापुराव बोथे को 25 मई 2026 को राष्ट्रपति Droupadi Murmu द्वारा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाएगा. वाशिम जिले के गोगरी गांव में 1939 में जन्मे बोथे पिछले 60 सालों से समाज सेवा और ग्रामीण विकास के कामों से जुड़े हुए हैं. वे बचपन में ही Tukdoji Maharaj के विचारों से प्रभावित हुए और बाद में उनके शिष्य बन गए. उन्होंने गुरुदेव सेवा मंडल के जरिए गांव-गांव जाकर मानवता, शिक्षा और समानता का संदेश फैलाया. जनार्दन बापुराव बोथे का मानना रहा कि सबकी भलाई ही सबसे बड़ा धर्म है और जात-पात व ऊंच-नीच मिटाना ही सच्ची सेवा है. साल 1972 में उन्होंने राष्ट्रसंत श्री तुकडोजी महाराज शिक्षण संस्था की शुरुआत की, जिसके जरिए आदिवासी, दलित और गरीब बच्चों तक शिक्षा पहुंचाई गई. उन्होंने नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य जागरूकता और ग्रामीण विकास जैसे कई अभियानों में भी अहम भूमिका निभाई. सादगी और सेवा से भरा उनका जीवन आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा माना जाता है.
खेलने की उम्र में सीखी कढ़ाई, सैंकड़ों महिलाओं की बनी मसीहा, पद्म श्री से सम्मानित तृप्ती मुखर्जी
बंगाल के छोटे से गांव सुरी की रहने वाली 60 वर्षीय श्रीमती तृप्ति मुखर्जी को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानिता किया जाएगा. इन्होंने 6 साल की उम्र से ही कढ़ाई करना शुरू कर दिया था. ये कला उन्होंने अपनी मां से सीखी थी. जिस उम्र में लड़कियां गुड़ियों की शादियों का खेल खेलती हैं, उस उम्र में ये इतिहास लिखने की तैयारी में जुट गयी थी. शादी के बाद इनके पति इनकी कला को बाजार में लोगों के बीच पहुंचाया, जिससे उन्हें पहचान मिलनी शुरू हुई. श्रीमती तृप्ति मुखर्जी में अपनी इस कला को आसपास के गांव की महिलाओं को सिखाया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद की. 300 से ज्यादा महिलाओं को इन्होंने पहचान दिलायी. लेकिन समय के साथ उन्हें गर्दन में समस्या और आंखों की जाती रोशनी ने कढ़ाई करने से रोक दिया. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने महिलाओं को प्रेरित करना नहीं छोड़ा. आज भी कई महिलाएं इनके काम से जुड़कर अपनी अजीविका चला रही हैं.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News18




















