पर्यावरण दिवस पर जनता को मिलेगा हरियाली का मार्ग, 'पीपल की छांव में ' बाबा ने साझा किया दशकों का अनुभव
पपील बाबा के नाम से मशहूर स्वामी प्रेम परिवर्तन एक पर्यावरणविद् हैं. उन्होंने अपनी टीम के साथ अब तक 18 राज्यों में ढाई करोड़ से अधिक पेड़ लगाए हैं. वे लोगों के प्रेरणासोत्र बन चुके है. इस बार 5 जून को पर्यावरण दिवस के दिन वह अपनी पुस्तक का विमोचन करने वाले हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘पीपल की छाँव में’ का जिक्र करते हुए कहा, हर आंदोलन का बीज विश्वास होता है. इसकी शुरुआत एक फुसफुसाहट से होती है, कुछ अच्छा करने की इच्छा से और यह एक जंगल में इसलिए तब्दील हो जाता है, क्योंकि दूसरे भी उसी भावना को महसूस करते हैं. मेरे मन में इस किताब का विचार 2012 में आया. इसे पूरा करने के लिए समय और शांति पाने में एक दशक से अधिक का वक्त लग गया. नवंबर 2024 में एक सड़क दुर्घटना हो गई.
2.70 लाख हेक्टेयर में वनस्पति को पुनर्स्थापित किया
लगभग पांच दशकों तक जमीनी स्तर पर काम करने के लिए 2.70 लाख हेक्टेयर में वनस्पति को पुनर्स्थापित किया. ढाई करोड़ पेड़ और उतनी ही झाड़ियां लगाने का काम किया. पीपल बाबा का कहना है, मैंने नाममात्र का ही बदलाव किया है, लेकिन मैंने कोशिश तो की है. यही मायने रखता है. ‘पीपल की छाँव में’ केवल कहानियां नहीं हैं. वे हमारी भारतीय मानसिकता के प्रतीक हैं. वे हमारे सामूहिक डीएनए का हिस्सा हैं. पीपल के पेड़ ने मुझे बचपन से ही आकर्षित करते रहे. मैंने इस अहम प्रजाति के पौधारोपण, संरक्षण और प्रचार-प्रसार में 48 वर्ष लगा दिए हैं. यह पुस्तक उस लंबे साथ को साझा करने का मेरा तरीका है.
दुनिया को उसके वास्तविक स्वरूप में देखें
पीपल बाबा का कहना है कि नानी की बदौलत उनका उत्तराखंड के जंगलों, कॉर्बेट, राजाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा परिचय हुआ. यह समर्पण के बारे में है. उन्होंने कहा, वे बस यह दिखाना चाहते हैं कि हरियाली और जैव विविधता से प्रेम करना कितना आसान है, छोटे-छोटे, सुंदर कदम उठाना कितना मायने रखता है. उन्होंने हमेशा अपने लिए लिखा है. उन्हें अपनी डायरी पढ़ना और पुरानी यादों को ताजा करना बेहतर लगता था.
बाद छोटे परिवार का तबादला हिमाचल प्रदेश के डलहौजी में हुआ. दशकों बाद महामारी के दौरान लगे लॉकडाउन में वह दीवारों में कैद नहीं रहे. वे पौधों को पानी देते, अपनी पीठ पर धूप महसूस करते, हवा से ऐसे बात करता जैसे वह उनकी कोई पुरानी दोस्त हो. प्रकृति ने हमें कैद में रहने के लिए नहीं बनाया. उसने खुला आसमान बनाया और उसे घर कहा.
कैंब्रियन हॉल स्कूल उनकी औपचारिक कक्षा बनी. उससे पहले, वे कोलकाता, डलहौजी और चंडीगढ़ में एक-एक साल पढ़ाई कर चुके थे. यह एक छोटे लड़के के लिए काफी चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम था.
हमारे घर की बागडोर संभालने आई थीं नानी
पीपल बाबा ने बताया, मेरी नानी मेरे जन्म के समय मेरी मां की मदद करने आई थीं, लेकिन सच तो यह है कि वे हमारे घर की बागडोर संभालने आई थीं. डलहौजी, कोलकाता और देहरादून होते हुए, अंत में अपने सबसे छोटे बेटे के साथ वह इलाहाबाद चली गईं. वे जन्म से लेकर स्नातक होने तक (1966-1986) तक हमेशा उनकी उपस्थिति में रहे. बाबा ने बताया, मिट्टी का वह टुकड़ा पर्यावरण के बारे में मेरी पहली शिक्षा थी. वहां उन्होंने सीखा कि धरती सुनती है, पानी का भी मिजाज होता है. बीज एक ऐसा वादा है जो कभी नहीं भूलता.
पीपल बाबा का कहना है कि पर्यावरणीय परिवर्तन केवल संस्थानों या नीतियों से नहीं होने वाला. इसके लिए साधारण नागरिकों को बीड़ा उठना होगा. हर वह समाज जिसने अपने प्राकृतिक संसाधनों का सफलतापूर्वक संरक्षण किया है. भूमि, जल और पौधों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा औ निभाया है. स्वयंसेवक किसी भी पर्यावरणीय आंदोलन की जीवंत नींव तरह हैं.
सालाना 70,000 रुपये की बचत
बाबा कहना है कि अगर आप उस छाया का मूल्य का आकलन करने लगें, तो आप हैरान रह जाएंगे. एक छायादार पेड़ की छांव से एक विक्रेता को रोजाना का किराया, लगभग 200 रुपये प्रतिदिन, देने से मुक्ति मिल सकती है. इस तरह सालाना 70,000 रुपये की बचत हो सकती है. पीपल के पत्ते की अपनी एक अलग खुशबू होती है. हल्की राल जैसी, मिट्टी जैसी, जिसमें हरी चाय और बारिश की हल्की-सी महक भी होती है. आयुर्वेद में पीपल के पत्तों का पाउडर अस्थमा के लिए और इसका काढ़ा हृदय रोगों के लिए उपयोग में किया जाता है. पवित्र शब्द ने मेरे लिए कई द्वार खोले. उन्होंने अपने नर्सरी के गमलों के साथ एक तीर्थयात्री की तरह प्रवेश कर गया. मराठवाड़ा में लोग नीम को बहुत पसंद करते थे, इसलिए मैंने उनकी गलियों को नीम से भर दिया. राजस्थान और गुजरात में अरावली की कठोर प्रजातियां चाहते थे- लसोड़ा, चामरोड़, बहेड़ा, निर्गुंडी, वज्रदंती, मेहंदी, करौंदा. औषधीय, सूखा-सहनशील, गर्वित छोटी प्रजातियां जो उस भीषण गर्मी में भी टिकी रह सकती हैं, जहां उम्मीद भी मुरझा जाती है. उन्होंने बताया कि चर्चित किताब, पेंग्विन प्रकाशन की ओर से लॉन्च की जा रही है तथा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजन आदि पर मिल सकती है.
पहाड़ों पर चेहरा नहीं होगा सीमेंट जैसा टैन, ट्रिप से पहले अपनाएं ये आसान उपाय, निखरी रहेगी त्वचा
पहाड़ों की ठंडी हवा और खूबसूरत मौसम भले ही सुकून देते हों, लेकिन वहां की तेज धूप स्किन को जल्दी टैन और डल बना सकती है. कई बार ट्रिप के बाद चेहरा रूखा और काला नजर आने लगता है. ऐसे में कुछ आसान स्किन केयर टिप्स अपनाकर टैनिंग से बचा जा सकता है.
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